संपादकीय। मध्यप्रदेश के इंदौर में सरकारी लापरवाही से हुई डेढ़ दर्जन मौतों को लेकर एनडीटीवी के संवाददाता ने प्रदेश के कद्दावर नेताओं में शुमार शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से जिस तेवर के साथ सवाल किया और कैलाश विजयवर्गीय ने सत्ता के जिस अहंकार के साथ अमर्यादित शब्दों का उपयोग करते हुए घटियेपन के साथ जवाब दिया और उस बातचीत का वीडियो वायरल होते ही जिस तरह का वातावरण बना उससे लगा कि पिछले 11 साल से जो मीडिया निहुर कर सत्ता की देहरी बुहार रहा है क्या उसकी रीढ़ सीधी होने का समय आने वाला है। लेकिन चंद घंटे के भीतर ही सामने आ गया कि ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है जब एनडीटीवी हाउस के मालिक ने अपने संवाददाता का वो जनप्रिय विस्फोट वीडियो ही डिलीट कर दिया। यानी पिछले 11 सालों से रीढ़ विहीन स्ट्रीम मीडिया आगे भी रीढ़ विहीन ही बना रहेगा। लेकिन जब तक एनडीटीवी हाउस का मालिक अपने संवाददाता का कैलाश विजयवर्गीय से सवाल जवाब वाला वीडियो डिलीट करता उसके पहले ही सोशल मीडिया ने उसे संजो लिया और अपनी रिपोर्टिंग शुरू कर दी।
अपने जमाने की, यानी आज की डेट में आउट डेटेड यानी खाली कारतूस से ज्यादा नहीं, भाजपा की एक नेत्री ने भी इंदौर कांड़ की आलोचना करके अपनी भड़ास निकाल ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री मोहन यादव, भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के घटिया चाल चलन पर मुंह नहीं खोलना था तो नहीं खोला। वैसे भी बीजेपी का चाल चलन खास तौर पर पिछले 11 सालों से तो यही दिखाई दिया है कि जब कोई भाजपाई दुराचार के गटर में डुबकी लगाते हुए पकड़ा गया है टाप लेबल ने शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन जमीन में धंसा कर अपनी टांगे ऊपर कर ली है। बीजेपी में ऐसे दुराचारियों की एक लंबी फेहरिस्त है जिनके दुराचार पर बीजेपी का हाईकमान यहां तक कि बाप संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी शुतुरमुर्ग बना हुआ देखा गया है। हां इंदौर कांड़ से इतना जरूर हुआ सोशल मीडिया के पीछे खड़े होकर स्ट्रीम मीडिया के कुछ संवाददाताओं ने एकबार फिर कैलाश विजयवर्गीय से सवाल पूछे और फर्क यह दिखा कि कैलाश विजयवर्गीय दुम दबा कर भागते नजर आये।
काश स्ट्रीम मीडिया 2014 के पहले यानी मनमोहन सिंह के दौर में जिस तरह से मुखर रहता था नरेन्द्र मोदी के दौर में उतना ना सही पचास फीसदी भी मुखर होता, सत्ता से सवाल करता तो जो दुर्दशा देश की हो रही है, लोकतंत्र को तानाशाही की ओर धकेला जा रहा है, संविधान को हासिये पर रख दिया गया है, लोकतांत्रिक संस्थान यहां तक कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट भी राजनीतिक सत्ता की मुट्ठी में कैद नहीं होते। देश के भीतर जिस तरह से धर्म और जाति विशेष को लेकर नफरती वातावरण बना दिया गया है नहीं बन पाता। बेटी पढ़ाओ का नारा बेटी बचाओ में तब्दील नहीं हो पाता। लोकतंत्र के तीन पिलर्स भले ही लड़खड़ा गये हैं चौथा पिलर मीडिया अगर अपनी रीढ़ सीधी रखकर अपने पैरों पर खड़ा होता तो निश्चित है कि मोदी सत्ता लाख चाहने के बाद भी तानाशाही को लोकतंत्र की चादर में लपेट कर पेश नहीं कर सकती थी।
2014 में पहली बार जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए दिल्ली का रास्ता तय किया उस दौर में पत्रकारिता के लिहाज से राष्ट्रीय अखबार हों या न्यूज चैनल सभी के भीतर राजनीतिक सत्ता से किये जाने वाले सवाल गूंजा करते थे। और उसी का असर था कि कोयला घोटाला, टू जी स्कैम, आदर्श घोटाला जैसे घोटाले लंबी फेहरिस्त के साथ सामने आये। जिसका भरपूर फायदा बीजेपी को मिला। यह अलग बात है कि आगे चलकर पता चला कि जो भी घोटाले एक के बाद एक सामने लाये गये एक पार्टी विशेष के द्वारा कुछ लोगों को हायर करके बाजीगरी के तौर पर प्रायोजित किये गये थे। देश तो यही आस लगाये था कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी देश के अखबार और न्यूज चैनल उसी तरह से मोदी सरकार से आंख में आंख डालकर सवाल करेगा। मगर नहीं। तत्कालीन इंफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्टर अरूण जेटली की इंडियन एक्सप्रेस से मुलाकात के बाद अचानक खबर आई कि अरूण जेटली ने साफ - साफ संदेश दे दिया है कि आपको अपनी रिपोर्टिंग को जिंदा रखने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उस समय बीजेपी अध्यक्ष रहे अमित शाह को लेकर रिपोर्टिंग नहीं करनी होगी। यानी दो लोगों पर कोई रिपोर्टिंग नहीं करेंगे। यह एक तरह से लोकतंत्र के चौथे पिलर पर सीधा तानाशाही प्रहार था।
उस दौर में मीडिया की कमाई विज्ञापनों के जरिए हुआ करती थी। मोदी सरकार ने एक नई चाल चलते हुए यह किया कि विज्ञापनों के जरिए अखबारों और मीडिया चैनलों को पैसा मिलता था उसके समानांतर लकीर खींचनी शुरू कर दी। यानी मोदी सरकार ने अपने ही विज्ञापनों के जरिए अखबारों और मीडिया चैनलों का पेट भरना शुरू कर दिया। 2014 से 2018 तक के दस्तावेज और आरटीआई के जरिए निकल कर आया कि उस दौर में निजी कंपनियों द्वारा अपने प्रचार प्रसार के लिए अखबारों और न्यूज चैनलों को जितनी रकम विज्ञापन के लिए दी जाती थी उससे ज्यादा रकम मोदी सरकार ने अखबारों और न्यूज चैनलों पर खर्च किये हैं। जो लगभग एक हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को छूता है। सरकार द्वारा चलाई जा रही तमाम योजनाओं और नीतियों को लेकर चाहे जो भी ऊंगली उठाई जाये लेकिन वो ऊंगली सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की तरफ नहीं उठनी चाहिए।
9999999999999999
उस दौर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसानों की आय दोगुनी करने की बात कह कर खुद मुसीबत में तब फंस गये थे जब राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल दूरदर्शन पर छत्तीसगढ़ की एक महिला को झांसा देकर यह बुलवाने में कामयाब हो गये थे उसकी आय दोगुनी हो गई है । इस बात का खुलासा खुद उसी महिला ने मीडिया के सामने यह कह कर कर दिया था कि उसे तो सिखाने पढ़ाने के लिए दिल्ली से टीमें आई थीं और उसने उसी टीम के कहने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से यह कह दिया कि हां मेरी आय दोगुनी हो गई है जबकि यह पूरी तरह से झूठ है। उसकी आय दोगुनी तो छोड़िए डेढ़ गुनी भी नहीं हुई है। इस बात का जिक्र तो उस गांव के सचिव ने भी किया था। इसके बाद यानी 2018 के बाद मोदी गवर्नमेंट ने स्ट्रीम मीडिया हाउस को एक नई ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी। उस ट्रेनिंग का मतलब बहुत साफ था कि आपकी रिपोर्टिंग राजनीतिक सत्ता को नहीं विपक्ष पर सवाल खड़ा करने के लिए होनी चाहिए। यानी राजनीतिक सत्ता को लेकर विपक्ष जो भी मुद्दे उठाता है, सवाल खड़ा करता है तो उन मुद्दों, सवालों के दायरे में अतीत की परिस्थितियों को, अतीत की गड़बड़ियों को उभारते हुए विपक्ष को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाय। सरकार की यह ट्रेनिंग कामयाब हो गई। स्ट्रीम मीडिया द्वारा अपने चैनल पर विपक्ष के नेता को बुलाकर एंकर्स द्वारा बकायदा जलील किया जाने लगा। लोकतंत्र का तकाजा है सब कुछ चलते रहना चाहिए। यह भी चर्चा में आया कि जलील होने के लिए विपक्ष न्यूज़ चैनल के बुलावे पर जाता ही क्यों है ?
राजनीतिक तौर पर राजनेता का अपना चरित्र किसी दूसरी पालिटिकल पार्टी के चरित्र से अलग होता नहीं है। पालिटिक्स का अपना एक चरित्र होता है जिसमें करप्शन भी है, झूठ भी है। जनता से कोई सरोकार भी नहीं है। जनता की आय और नेता की आय में व्यापक अंतर भी है। यहां तक कि विधानसभा और संसद के भीतर बैठकर अपनी आय को बढ़ाने के लिए एक ही चादर ओढ़ कर गुड़ खाया जाता है। लेकिन कभी भी किसी भी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस बात को लेकर सवाल नहीं किया। एक तरफ देश की जनता नौकरी के लिए मोहताज है और आप मालामाल हो रहे हैं। स्ट्रीम मीडिया की इस नपुंसक पत्रकारिता का असर यह हुआ कि देश के भीतर सोशल मीडिया के नाम का एक नया मीडिया आकर खड़ा हो गया। जिसकी एक छोटी सी खिड़की के जरिए राजनीतिक सत्ता से सवाल करना शुरू हो गया। सरकार द्वारा छिपाये गए एजेंडे सामने आने लगे। स्ट्रीम मीडिया के जरिए मोदी सरकार जिस तरह से आंख - नाक - कान लगभग बंद कर चुकी थी उसे सोशल मीडिया ने देश के भीतर फिर से खोल कर रख दिया। लोकतंत्र को लेकर, संविधान को लेकर, संवैधानिक संस्थानों को लेकर, चुनाव आयोग को लेकर, सुप्रीम कोर्ट को लेकर, जनता के मूलभूत मुद्दों को अपने तरीके से सवाल उठाकर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाने लगा।
स्ट्रीम मीडिया ने तो भरसक कोशिश की कि अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सरसंघचालक मोहन भागवत का जो कच्चा चिट्ठा पहले पन्ने पर छापा गया है देशवासियों के सामने नहीं आने पाये लेकिन सोशल मीडिया ने सब कुछ देश के सामने उजागर करके रख दिया। इस तरह की खबरों की भी एक लंबी फेहरिस्त है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी जिन बातों का जिक्र जर्मनी, अमेरिका, यूरोप के अलग - अलग देशों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार द्वारा गवर्नेंस के तौर तरीकों को तानाशाही में तब्दील कर दिया गया है वह भी सोशल मीडिया पर वायरल होकर ही देश के सामने आए हैं। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पार्लियामेंट के भीतर खुले तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इलेक्शन कमीशन, इलेक्शन कमिश्नर को एक इम्यूनिटी दे दी है कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी यानी आप नंगा नाच भी करिये लेकिन वह राजनीतिक सत्ता के मनोरंजन के लिए हो। आपको सारे खून माफ हैं बस हमारी सत्ता बरकरार रहनी चाहिए।
देश हो या प्रदेश जहां पर भी बीजेपी की सरकार है उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ही चला रहे हैं ! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा ही हर जगह पोस्टरों में नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे के आसरे ही राजनीति साधी जाती है। यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही पूरे सिस्टम के नायक हैं, फेस हैं। तो फिर मोदी का नाम सीधे तौर पर हर घटना - दुर्घटना के साथ क्यों नहीं जोड़ा जाना चाहिए ? अरावली की लूट हो या मोरवी पुल गिरने से हुई मौतें हो। उन्नाव कांड़ हो या ऋषिकेश कांड़ या फिर इंदौर कांड़। चुनाव आयोग की गतिविधियों को लेकर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी कहीं न कहीं दिखाई देती है। पिछले 11 सालों से कब्र में दफन मीडिया का अचानक खड़ा होकर अरावली, उन्नाव, इंदौर को लेकर एक नये तेवर के साथ सवाल पूछ रहा है तो क्या मीडिया की बाजीगरी सोशल मीडिया की वजह से तो नहीं है और यह डमरू प्रधानमंत्री कार्यालय के ईशारे पर तो नहीं बजाना शुरू किया गया है. ? जिससे मोदी सरकार और खुद की गिरती हुई साख को सम्हाला जा सके ? लेकिन पार्लियामेंट के भीतर की इस हकीकत को क्या कहेंगे।
It is very clear that you capture the institution. I have shown the mechanism of that capture. I am also showing you how the election commission is doing things that are completely out of line. I am not gating any answer. And finally please change the law that allowance the election commissioner to gate away with what ever he wants to do. That's all the electoral reforms you need. And I want to asure the election commissioner that they mite we under the impression that this law lets them gate away with it lets me. लेकिन इसे कोई मुद्दा होना ही नकार दिया गया है। देश के भीतर चुनाव लूटे जा रहे हैं। सरकार लूटी जा रही है। वोटर लिस्ट सत्तानुकूल तैयार कर ली गई है। इलेक्शन कमिश्नर की पोस्टिंग सत्तानुकूल सत्ता कर रही है। इलेक्शन कमीशन की भूमिका सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक सत्ता के लिए होकर रह गई है। यानी देश के भीतर लोकतंत्र के रक्षक या निगरानी करने वाली संस्था के तौर पर चुनाव आयोग कहां पर है कोई नहीं जानता है। इसे भी मुद्दा विहीन मान लिया गया है। विपक्ष द्वारा लगातार उठाए जा रहे सवाल भी राजनीतिक सत्ता के लिए कोई मुद्दा नहीं है।
बीजेपी के लिए तो बीजेपी ही एक मुद्दा बन गया है। उसके हद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को छोड़ कर बीजेपी का हर नेता आता है कभी योगी आदित्यनाथ, तो कभी शिवराज सिंह चौहान तो आज कैलाश विजयवर्गीय। अभी उमा भारती ने भी इंदौर को मुद्दा बनाकर कार्रवाई करने की मांग करके अपनी भड़ास ही निकाली है। हां बीजेपी के सामने जब भी कोई बड़ मुमुद्दा सामने आता है तो उस बड़े मुद्दे को ढकने के लिए छोटे छोटे मुद्दों के आसरे बहस बड़ी कर दी जाती है। फिर कहा जाता है कि देखिए सब कुछ ठीक है। हर कोई जागृत है। लोकतंत्र बरकरार है। लोकतंत्र के सारे पिलर मजबूती के साथ खड़े हैं। यानी सवालों को ही गायब कर दिया जाता है। जनता के भीतर चुनाव के माध्यम से लोकतंत्र की सहभागिता है या कहें साथ खड़े होने की जो सोच है वह भी कोई मुद्दा नहीं है।
एक ऐसे नैरेटिव के जरिए देश को गढ़ने की कोशिश की जानी चाहिए जिसमें देश का नायक या खलनायक हर कोई नियम के मुताबिक अपना काम करे लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। लेकिन यहां तो उस प्यादे ने राजा को मात दे दी जिस प्यादे को उसी ने राजा बनाया था। उस प्यादे ने एक नये राजा को खड़ा कर दिया है। यानी एक ऐसे विजुअल माध्यम के जरिए अलग - अलग क्षेत्रों के अलग - अलग नायक और खलनायक पर बहस होने लग गई और यह नायक और खलनायक उसी महानायक की उपज हैं जिसके जरिए देश में 2014 के बाद सत्ता गढ़ी गई और उसी के आसरे सब कुछ अपनी ऊंगलियों पर नचाने की परिस्थितियां पैदा कर दी गई। इस बाजीगरी में जनता खड़ी कहां है ? ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। 10 साल में पत्रकारिता के भीतर समा चुकी नपुंसकता 2026 में एक झटके में मर्दानगी में तब्दील होने वाली नहीं है। हां बीच-बीच में मर्दानगी जैसी मृगमरीचिका के झटके जरूर देखने को मिलेंगे।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार


