संपादकीय। दुनिया की नजर भारत के बाजार, भारत के खनन, भारत की पूंजी, भारत के कार्पोरेट पर है क्योंकि उनकी नजर में भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। अमेरिका भी इसी सोच के साथ भारत को तौल रहा है और मौजूदा राजनीतिक सत्ता की घिघ्घी बंध जाती है अमेरिका के सामने। सारे अंतरराष्ट्रीय नियम कानून मापदंड को ताक पर रख विशुद्ध दादागिरी तरीके से वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अगवा करके अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को चेतावनी भरा यह संदेशा तो दे ही दिया है कि दुनिया को अब उसके इशारों पर ही नाचना होगा। वेनेजुएला से आगे कदम बढ़ाते हुए ट्रंप ने कहना शुरू कर दिया है कि अब उसे अपनी सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड चाहिए। सवाल सुरक्षा के रास्ते व्यापार का है क्योंकि ग्रीनलैंड में दुनिया का एक चौथाई (25%) रेयर मैटल्स है। उस मैटल्स के ज्यादातर हिस्से में चीन का कब्जा है। वैसे भी चीन ने ग्रीनलैंड में काफी पैसा लगाया हुआ है। भारत वेनेजुएला से भी तेल खरीदता है लेकिन अब उस पर भी अमेरिका के ईशारे पर ठीक उसी तरह से ब्रेक लग गई जैसे रशिया से तेल लेने में लग गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ा सवाल इस बात को लेकर खड़ा हो गया है कि क्या अमेरिका अब अंतरराष्ट्रीय सिपाही की तरह काम करने लगा है यानी अब अमेरिका में लोकतंत्र नहीं रह गया है। इसी के साथ ही यह सवाल भी आकर खड़ा हो गया कि भारत की पहचान भी दुनिया में सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में होती है तो भारत ने यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सारे अंतरराष्ट्रीय मापदंडों को ताक पर रख कर वेनेजुएला में ट्रंप द्वारा की गई कार्रवाई का विरोध क्यों नहीं किया ? जबकि दुनिया भर के उन देशों ने खुलकर विरोध जताया जिन्हें भारत किसी न किसी रूप में अपना सहयोगी बताता रहता है। उसमें चीन, रशिया, ईरान, साउथ अफ्रीका, ब्राजील को शामिल किया जा सकता है।
ग्रीनलैंड कब्जाने को लेकर कही गई ट्रंप की बात ने पूरे यूरोप के भीतर हड़कंप मचा दिया। सारी यूरोपीय कंट्रीज ने एक स्वर में ट्रंप के बयान की निंदा करते हुए कहा यह ठीक नहीं है। मगर भारत के भीतर सवाल तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस कहे को लेकर है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रशिया से तेल खरीदना इसलिए कम कर दिया है क्योंकि वह मुझे (ट्रंप) खुश करना चाहते हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ट्रंप के कहे का खंडन करने के बजाय खामोशी की चादर ओढ़े बैठे हुए हैं ? ट्रंप तो इस तरह कह रहे हैं जैसे भारत स्वतंत्र देश ना होकर अमेरिका की कोई रियासत है और अमेरिका ने यहां पर किसी राजा (नरेन्द्र मोदी) को नियुक्त कर रखा है। तभी तो वह इस तरह के शब्दों का उपयोग कर रहे हैं भारत के प्रधानमंत्री को लेकर और भारत के पीएम खामोश हैं। यानी भारत की जो भी छबि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी हुई थी उसे भी धराशाई किया जा रहा है। दुनिया में अपनी दादागिरी बनाये रखने के लिए ट्रंप का ट्रंप कार्ड है टैरिफ। ट्रंप अपने इसी ट्रंप कार्ड के दम पर भारतीय प्रधानमंत्री को खुले तौर पर Indian Prime Minister my good friend कह कर एक साथ कई सवालों को जन्म दे रहे हैं कि ट्रंप का माई गुड फ्रेंड कहना ट्रंप का मोदी के प्रति प्यार है या फिर धमकी है, चेतावनी है, दादागिरी है, भारत को कुछ भी ना समझने की सोच है, या फिर जिस तरह से भारत इस दौर में जिस तरह से चीन और रशिया के करीब जा रहा है उसको लेकर एक मोटी लकीर खींचने की की कोशिश है जिसमें भारत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों परिस्थितियों में हमारे साथ (अमेरिका) खड़े होना पड़ेगा।
सवाल है कि बांग्लादेश में जो राजनीतिक परिवर्तन हुआ और जिस तरह से बांग्लादेश का युवा जिसे जंजी कहा गया सड़क पर आकर खड़ा हो गया, इससे पहले श्रीलंका, नेपाल में जो कुछ हुआ इन सबके पीछे कौन था ? क्या इसमें अमेरिकी ताकतें थीं ? क्या इसमें अमेरिका की मौजूदगी थी ? क्या अमेरिका का पैसा था ? क्या अमेरिका के जरिए दखलंदाजी थी ? या फिर उन देशों के भीतर अमेरिका के आर्थिक संबंध थे जिसमें वह अपनी शर्तों के साथ सीधे तौर पर खड़ा होता चला गया। और शायद यही वो कारण हैं जो वेनेजुएला में हुआ, ईरान की तरफ अमेरिका के कदम बढ़ रहे हैं, क्यूबा और ग्रीनलैंड को लेकर कह रहा है और भारत को धमकी दे रहा है। दुनिया के तमाम देश यह तो कह रहे हैं कि अमेरिका जो कर रहा है वह यूनाइटेड नेशंस के इंटरनेशनल चार्ट के खिलाफ है लेकिन इसके भीतर की परिस्थितियों में भारत के भीतर के मुद्दे भी अमेरिका समझ रहा है। वह जानता, समझता है कि राजनीतिक तौर पर मौजूदा राजनीतिक सत्ता को माय फ्रेंड कहना उसकी जरूरत है या फिर अंतरराष्ट्रीय तौर पर वह भारत को चेता रहा है। यह सवाल इसलिए है क्योंकि जो ईरान में हो रहा है, जो वेनेजुएला में हुआ और उसके बाद जिस तरह से चाइना ने रिएक्ट किया कि आप वर्ल्ड पुलिस नहीं हैं, आप इंटरनेशनल जज भी नहीं हैं। रशिया ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ताक पर रख कर अपने तरीके की तानाशाही ना चलावे अमेरिका। लेकिन इसके पीछे की हकीकत यह है कि वेनेजुएला पर चीन की 19 अरब डॉलर की देनदारी है। वैसे तो दुनिया के लगभग डेढ़ सौ देशों के ऊपर चीन की लगभग 1.3 ट्रिलियन डॉलर की देनदारी है। क्योंकि चीन ने जिस भी देश में परियोजनाओं को लेकर अपने पर फैलाये हैं उन देशों को कर्ज देकर उसने उन देशों को अपने अनुकूल किया है। चाइना को अपने द्वारा दिए गए कर्जे की चिंता है शायद इसीलिए वह भी अमेरिका को चेता रहा है। हेक से लेकर सिंगापुर तक कानूनी तौर पर पहल की जायेगी। इस बार मिसाइल से नहीं अंतरराष्ट्रीय संबंधों और नई विश्व व्यवस्था में अमेरिका को लेकर बातचीत होगी और इसके लिए तैयार हैं हम। ईरान को लेकर ट्रंप कह रहे हैं कि हमारी नजर पैनी है, हम देख रहे हैं, कोई गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए अगर एक भी प्रदर्शनकारी मारा गया तो हम मैदान में कूदने के लिए तैयार हैं। दरअसल यह मैसेज उस राजनीतिक व्यवस्था के लिए है जिस राजनीतिक व्यवस्था में कोई भी देश अगर वह अमेरिका के साथ उसकी अपनी शर्तों पर नहीं खड़ा है।
इस दौर में भारत के भीतर भी आर्थिक परिस्थिति, युवा, चुनावी प्रक्रिया आदि सवालों का झंझावात खड़ा हो रहा है। चुनावी प्रक्रिया को जिस तरह से चलाया जा रहा है उसमें बीजेपी को जीत मिलनी ही मिलनी है। राजनीतिक दल भी यह मानकर चलने लगे हैं कि हम कोई भी मुद्दे उठायेंगे तब भी हमें हार ही मिलेगी और इसके बाद यही प्रोपेगेंडा फैलाया जायेगा कि जनता ने आपको ठुकरा दिया है। देश में इस तरह का माहौल मौजूदा राजनीतिक सत्ता ने बना दिया है कि आर्थिक परिस्थिति और युवा बेरोजगारी मुद्दे की लिस्ट से बाहर हो चुके हैं । तो क्या इस दौर में जो अलग - अलग मुद्दे अलग - अलग राज्यों में उभर कर सामने आए हैं जिसमें देश की राजनीति, चुनावी प्रक्रिया कोई मायने नहीं रखती तो क्या उन्हें बतौर मुद्दा बनाने के लिए युवाओं को खुद पहल करनी होगी.? तो सवाल यह भी है कि क्या युवाओं की पहल भारत के भीतर की तमाम परिस्थितियों को बदल सकती है ? देश का युवा अब यह महसूस करने लग गया है कि सत्ताधारी बीजेपी से जुड़े हुए हर रेपिस्ट को, हर मर्डर्र को, कानून को अपने हाथ में लेकर नंगा नाच नाचने वाले को विशिष्टतम व्यक्तियों में शुमार किया जाता है। चाहे वह उन्नाव कांड़ में हो, या ऋषिकेश कांड़ हो या फिर महिला पहलवानों का यौन उत्पीड़न कांड़ हो, ऐसे कांडों की लंबी फेहरिस्त है। शायद इसीलिए पहली बार उत्तराखंड की सड़कों पर ऐसा नजारा नजर आया। शहर - गांव के लोग थे जिनमें बूढ़ी महिलाओं की भागीदारी थी, बुजुर्गों की भागीदारी थी, युवाओं की भागीदारी थी लेकिन अगर भागीदारी नहीं थी तो राजनीति की भागीदारी नहीं थी, किसी भी राजनीतिक दल की भागीदारी नहीं थी । सड़कों पर खड़ा हुजूम जो लोकतंत्र को जीना चाहता है, कानून के राज के हिसाब से चलना चाहता है लेकिन इस दौर में कानून के राज को तो मौजूदा राजनीतिक सत्ता द्वारा राजनीतिक सत्ता को पाने के लिए और सत्ता पाने के बाद उसे बरकरार रखने के लिए खत्म कर दिया गया है। तो ऐसी राजनीति से विपक्षी राजनीति जीत हासिल कर नहीं सकती है। इसलिए अब जनता को ही मोर्चा सम्हालने आगे आना होगा क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब भी जनता अपने बूते सामने आकर खड़ी हुई है तो बड़े से बड़े तानाशाह को भी घुटनाटेक होना पड़ा है। तो क्या भारत के भीतर ऐसी परिस्थिति आ चुकी है कि मौजूदा राजनीतिक सत्ता, सत्तानुकूल हो चले चुनाव आयोग, सत्तानुकूल फैसले दर फैसले दे रही अदालतों (तहसील अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट) को लोकतांत्रिक मर्यादाओं के दायरे में रह कर संविधान और कानून के हिसाब से चलाने के लिए जनता को देशभर में सड़कों पर उतरना होगा ? उत्तराखंड की सड़कों पर खड़ा हुजूम तो देश को कुछ ऐसा ही संदेश दे रहा है और यह संदेश उस परिस्थिति के बीच से निकल कर आ रहा जहां मोदी सत्ता के पास हिन्दुत्व और धर्म की राजनीति के आसरे चुनाव दर चुनाव सिर्फ और सिर्फ जीत हासिल करने का ट्रंप कार्ड है।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार


