उत्तर प्रदेश। इस समय पूरे देश की नजर एक ही व्यक्ति पर है वह हैं गोरखनाथ मंदिर पीठाधीश्वर महंत, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (अजय सिंह विष्ट)। देश में एक ही व्यक्ति की चर्चा हो रही है वह हैं बद्रीकाश्रम पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती। इसी बीच यह भी खबर चल रही है कि योगी आदित्यनाथ और अमित शाह के बीच तनातनी इतनी बढ़ गई जिससे योगी बाबा का सिंहासन डोल सकता है क्या ? अगर ऐसा होता है तो फिर योगी क्या करेंगे ? ना खाऊंगा ना खाने दूंगा का राग अलापने वाली बीजेपी उत्तर प्रदेश के भीतर बुरे दिन देख सकती है क्या ? क्या यूपी में इन दिनों योगी शाह के बीच हम भी खेलेंगे नहीं तो खेल बिगाडेंगे यानी हमें भी खिलाओ नहीं तो हम रायता बगरा देंगे का खेला जा रहा है ? और उसके बीच में दुर्भाग्यवश शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती आ गये हैं और अब वे कबीर की साखी पढ़ रहे हैं - चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय। योगी महंत पहले हैं मुख्यमंत्री बाद में। महंत का मतलब ही है किसी न किसी धर्म से जुड़ा होना। मुख्यमंत्री का अर्थ है संविधान के मुताबिक धर्मनिरपेक्षता की शपथ लेकर सूबे की बागडोर अपने हाथ में लेना। सवाल है कि दोनों एक साथ चल कैसे सकते हैं ? सिवाय सत्ता के लिए धर्म के रास्ते को दिखावटी तौर चलते और चलाते रहने के। लगता है योगी ने सोच लिया है कि अगर तुम मेरे खिलाफ साजिश रचोगे, मुझे हटाने की प्लानिंग करोगे तो मैं रायता बगराने से पीछे नहीं हटूंगा जो तुम्हारे समेटे नहीं सिमटेगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जिस तरह से गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनाकर नरेन्द्र मोदी को हिन्दुत्व के ब्रांड के रूप में पेश किया था ठीक उसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश को हिन्दुत्व की नई प्रयोगशाला बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ उर्फ अजय मोहन सिंह विष्ट को हिन्दुत्व के एक बड़े ब्रांड के रूप में महिमामंडित करते हुए पेश किया गया और आज की तारीख में बीजेपी के पास योगी आदित्यनाथ की बराबरी का एक भी हिन्दुत्ववादी चेहरा नहीं है, नरेन्द्र मोदी भी नहीं हैं । गुजरात से ही आने वाला एक कट्टर हिन्दुत्ववादी चेहरा था नरेन्द्र मोदी से भी कट्टर जिसे राजनीतिक शाजिस के जाल में लपेट कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिन्दुत्ववादी संस्था विश्व हिन्दू परिषद से बाहर करवा दिया गया नाम है प्रवीण तोगड़िया। ना जाने किन ख्यालों में गुम होकर योगी बाबा ने सनातन की धुरी या कहें धर्मध्वज कहे जाने वाले शंकराचार्यों में से एक बद्रीकाश्रम पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से सीधा पंगा ले लिया है। या कहें बाबा पर अफसरशाही इतनी सवार हो गई कि उसने मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज में गंगा के भीतर बाबा की लुटिया ही डुबो दी। अफसरों ने अविमुक्तेश्वरानंद को बकायदा नोटिस देकर शंकराचार्य होने का सबूत मांग लिया। जबकि यह अधिकार तो भारत के राष्ट्रपति को भी नहीं है ! शंकराचार्य का फैसला तो शंकराचार्य ही कर सकते हैं। अविमुक्तेश्वरानंद ने भी 2025 में महाकुंभ के दौरान प्रशासन द्वारा प्रकाशित करवाई गई स्मारिका जिसमें बकायदा अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की तस्वीर शंकराचार्य संबोधित करते हुए छापी गई थी मीडिया के सामने रख दी। इतना ही नहीं उन्होंने गोरखनाथ पीठ, जिसके योगी आदित्यनाथ पीठाधीश्वर हैं, के भीतर बतौर शंकराचार्य पूजा अर्चना करने का वीडियो भी शेयर किया।
खबर है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ शेष तीनों शंकराचार्य मार्च के महीने में दिल्ली में एकत्रित होकर बड़ा आंदोलन करने वाले हैं। 1989 यानी 26 साल बाद चारों शंकराचार्य एक साथ एक मंच पर विराजमान होंगे। तो क्या एक बार फिर अहंकारी सत्ता दिल्ली की सड़कों पर साधु संतों का कत्लेआम करेगी उन पर गोलियां चलवायेगी। और फिर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकेगी ? क्योंकि जिस तरह से हिन्दू धर्मावलंबी दो भागों में बंटे दिखने लगे हैं और सत्ता पोषित तथाकथित कथावाचकों द्वारा सरकार की चाकरी करते हुए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को अपमानित करने के लिए अमर्यादित टिप्पणियां की जा रही हैं और सत्ता तथा अपने आपको हिन्दुत्व का सबसे बड़ा झंड़ावरदार कहने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक चुप है उससे खतरनाक संकेत मिल रहे हैं। गत दिवस ही भगवा झंड़ाधारियों ने हथियारों से लैस होकर खुद को योगी आदित्यनाथ का फालोवर्स बताते हुए शंकराचार्य के धरना स्थल पर आतंक फैलाया है और योगी सरकार ने आंख कान बंद रखे। उसने लाॅ एंड आर्डर यानी कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान तो लगा ही दिया है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि हिन्दुत्व की राजनीति करते हुए दिल्ली की सल्तनत पर कब्जा करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के साथ ही सनातन और हिन्दुत्व की पैरवी करने वाले संघ सरसंघचालक मोहन भागवत ने शंकराचार्य के हो रहे अपमान पर अच्छा या बुरा एक शब्द भी नहीं बोला। यह अलग बात है कि दिल्ली की राजनीतिक सत्ता (गुजराती जोड़ी) ने आरएसएस के साथ ही पूरे देश को समझा दिया कि हिन्दुत्व की विचारधारा से सत्ता नहीं दिलाई जा सकती है सत्ता दिलाने के तौर तरीके अलग होते हैं। गुजराती जोड़ी ने राजनीति के भीतर जिस मंत्र को फूंका उसकी पहली शर्त ही है पास में हिन्दुत्व नहीं पास में सत्ता होनी चाहिए।
पत्रकारिता जगत में शंकराचार्य विवाद को किसान आंदोलन के समकक्ष रखकर विवेचना की जा रही है। किसान आंदोलन को भी सरकार ने प्रारंभिक चरण में बहुत हल्के में लिया गया था लेकिन जब यह आंदोलन सरकार के गले की हड्डी बना तो सरकार ने अपने लोगों की एंट्री कराई आंदोलनकारियों के बीच लेकिन वही सरकार के लिए भस्मासुर बन गये। दिल्ली सल्तनत ने दो जगहों पर दिल्ली बाॅर्डर पर यानी गाजीपुर बॉर्डर और हरियाणा बाॅर्डर पर किसानों के ऊपर बर्बरता बरती। लेकिन आंदोलन बढ़ता चला गया और आखिरकार मोदी सरकार को ना केवल तीनों किसान विरोधी काले कानून वापस लेने पड़े बल्कि पीएम नरेन्द्र मोदी को खुद किसानों से माफी मांगनी पड़ी। तो क्या शंकराचार्य विवाद को माफी मांग कर हल नहीं किया जा सकता है ? क्या इसके लिए भी किसी ट्रंप जैसे के फोन का इंतजार किया जा रहा है ? जिस तरह दुश्मन देश पाकिस्तान के साथ चले आपरेशन सिंदूर में सीजफायर किया गया था। देखा जाय तो शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पास योगी आदित्यनाथ की तुलना में खोने के लिए कुछ भी नहीं है। उनकी शंकराचार्यी कोई ले नहीं सकता है। ऐसी कोई खेती बाड़ी तो है नहीं जिसे सरकार छीन लेगी। लेकिन किरकिरी तो लखनऊ और दिल्ली की हो रही है। खोने के लिए तो बीजेपी और आरएसएस के पास है। पिछले 40 सालों से ये साधू संतों के कांधे पर सवार होकर हिन्दुत्व की राजनीति कर रहे हैं। आज उन्हीं को अपमानित किया जा रहा है और लखनऊ से लेकर दिल्ली, नागपुर तक चुप्पी पसरी हुई है। तो क्या यह माना जाय कि इस सारी घटना के पीछे बीजेपी और संघ का हाथ है ?
योगी तो खुद संत परम्परा से आते हैं। अगर योगी बाबा शंकराचार्य से माफी मांग कर इस विवाद का पटाक्षेप करते हैं तो इससे योगी का ही मान बढ़ेगा। सही मायने में अगर लड़ाई लखनऊ और दिल्ली के बीच में है तो खुल कर खुला खेल फरुख्खावादी होना चाहिए। जब से मोदी ने दिल्ली की सल्तनत संभाली है और योगी को लखनऊ भेजा गया है तबसे बीजेपी के पास योगी आदित्यनाथ ही एकमात्र हिन्दुत्व का एग्रेसिव चेहरा हैं और वही चेहरा अब दिल्ली के लिए खतरा बन गया है। इसीलिए अब दिल्ली उस खतरे से पार पाना चाहती है वह भी मोदी के उत्तराधिकारी को लेकर क्योंकि अमित शाह खुद को नरेन्द्र मोदी का विकल्प मानकर चल रहे हैं। शायद इसीलिए अमित शाह घबराये और बौखलाए हुए हैं। शायद इसीलिए योगी का इलाज करना चाहते हैं। चर्चा के मुताबिक सीएम योगी आदित्यनाथ ने पटरी ना बैठाने वाले प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना की तर्ज पर बोल बतिया रहे हैं। चौपाली चर्चाओं में सुनाई दे रहा है कि दिल्ली लखनऊ को गोरखपुर से मुक्ति दिलाकर कानपुर के हवाले करके गोरखपुर को दिल्ली लाना चाहती है जिससे वह उत्तर प्रदेश के एक ठाकुर को मार्गदर्शक मंडल में भेजकर दूसरे ठाकुर से भरपाई कर ले लेकिन गोरखपुर किसी भी हालत में दिल्ली आने को तैयार नहीं है सिवाय दिल्ली सल्तनत को छोड़ कर। यूपी के भीतर हिन्दुत्व का बहुमत योगी बाबा के साथ है। बाबा ने अपनी एक लाॅबी भी तैयार कर ली है जो बाबा के एक इशारे पर सड़कों पर उतरने के लिए हर दम तैयार रहती है । अगर गुजराती जोड़ी ने बाबा के साथ जोर जबरदस्ती की तो फिर यूपी से हिन्दुत्व भी काफूर हो जायेगा।
खबर है कि योगी आदित्यनाथ को नाथने के लिए गुजराती जोड़ी कई विकल्पों पर विचार कर रही है। मसलन उत्तर प्रदेश के टुकड़े करके योगी को धामी बना दिया जाए। यानी 18 जिलों की 18 सीट ले लो और जो उखाड़ते बने उखाड़ लो। एक तीर से कई निशाने साध लिए जायेंगे। योगी के साथ ही मायावती और अखिलेश यादव का भी इलाज हो जायेगा। शायद इसीलिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड की अलग मांग करने वालों को सक्रिय होने का संदेश भेज दिया गया है। दिल्ली देने को तैयार बैठी है आप मांगिये तो सही। इसे कहते हैं रायता बगराना, 80 नहीं 18। योगी कालखंड में हुए कुछ घोटालों के जरिए भी योगी आदित्यनाथ को घेरने पर विचार किया जा रहा है। योजनाएं तो कई चल रही हैं। लेकिन अंत किस योजना से होगा ? क्या पटाक्षेप होगा ? ऊंट किस करवट जाकर बैठेगा ? कहाँ योगी आदित्यनाथ को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जाने की चर्चा थी। कहाँ अब राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह मिलने के लाले पड़ते दिख रहे हैं। कहा जा रहा है कि 35 से 55 के बीच वाले ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लिए जायेंगे ना नीचे वाले ना ऊपर वाले और बाबा 65 के हो चले हैं तो फिर फिट बैठेंगे कैसे ? यूपी में योगी (ठाकुर) के समानांतर संगीत सुमन को खड़ा करने की कोशिश की गई लेकिन सोम को योगी ने ठीक उसी तरह खींचकर पीछे की तरफ खड़ा कर दिया जैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नये नवेले पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन का हाथ पकड़ कर अपने पीछे कर दिया था।
बीजेपी को ब्राम्हण बनियों की पार्टी माना जाता रहा है। बीजेपी के भीतर जातियों को लेकर असंतोष बढ़ने की खबर है। जिस तरह से क्षत्रियों को एकजुट किया जा रहा है उससे बैकवर्ड क्लास और दलितों के साथ ही ब्राम्हणों में भी नाराजगी है। बीजेपी जानती है कि यूपी में अगर ब्राम्हण नाराज हो गए तो मुश्किल होगी। क्या इसीलिए ठाकुर की जगह ब्राम्हण की पर्ची निकालने पर विचार किया जा रहा है। अगर ऐसा होता है तो शंकराचार्य विवाद से नाराज हुए ब्राम्हणों को भी साध लिया जायेगा। शिक्षा, रोजगार, नौकरी, मंहगाई, भृष्टाचार, आदि की कोई चर्चा नहीं की जा रही है। सड़कें बनते ही टूट रही हैं, स्कूल बंद हो रहे हैं, पर्चे लीक हो रहे हैं, नौकरियां हैं नहीं तो बीजेपी चाहती है कि चर्चा धर्म पर हो अच्छी हो या बुरी। चमकेगा सनातन ही। सनातन को पुरातन नहीं बनने देना है। सारी चर्चाओं को छोड़ कर केवल धर्म पर चर्चा करनी है। बंटोगे तो कटोगे इसलिए बंटना नहीं है। आपस में लड़ते मरते रहो लेकिन एक जगह रहो। 2027 - 2029 तक ये रामलीला चलती रहेगी। 2027 में सीताहरण और 2029 में रावण वध। उसके पहले सवाल यही हैं क्या योगी कुर्सी छोड़ेंगे ? क्या दिल्ली लखनऊ पर हावी हो जायेगी ? क्या संघ परिवार यूं ही खामोश रहेगा ?
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार

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