संपादकीय। भारत की तथाकथित 100 स्मार्ट सिटियों में सबसे अब्बल नंबर की स्मार्ट सिटी कही जाती है मध्य प्रदेश का इंदौर शहर। यह भारत के भीतर का वही मध्यप्रदेश और उसका शहर इंदौर है जहां पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक, मेयर, वार्ड पार्षद, अर्बन डवलपमेंट मिनिस्टर यानी ए टू जेड सभी भारतीय जनता पार्टी के हैं। खास बात यह है कि प्रदेश के अर्बन डवलपमेंट मिनिस्टर भी इंदौर के ही रहवासी हैं, यहीं से विधायक भी हैं, म्युनिसिपल कार्पोरेशन के मेयर भी रह चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इसी तथाकथित स्मार्ट सिटी यानी इंदौर में नाले का दूषित पानी जो वार्डवासियों को म्युनिसिपल कार्पोरेशन द्वारा नल के जरिए उनके घरों पर सप्लाई किया गया उसको पीकर दर्जन भर से ज्यादा लोग असमय ही परलोक सिधार गए। दो सैकड़ा से ज्यादा लोग हास्पिटल में इलाजरत हैं जिनमें 2 की हालत गंभीर बताई जा रही है। यह अलग बात है कि मरने वालों की संख्या जहां सरकार 10 बता रही है तो अर्बन डवलपमेंट मिनिस्टर 9 बता रहे हैं और मीडिया इसे 14 बता रहा है। और जब एनडीटीवी के पत्रकार ने शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से सवाल किये तो कैलाश विजयवर्गीय अपनी पुरानी आदतानुसार घटियापने पर उतर आये। ये वही कैलाश विजयवर्गीय हैं जिनके विधायक रहे बेटे ने नगर निगम के एक अधिकारी को क्रिकेट के बल्ले से गेंद की तरह पीटा था और आखिरी में मार खाये बेइज्जत हुए अधिकारी को ठीक उसी तरह से अपना केस वापस लेना पड़ा जैसे एक वक्त मुड़वारा विधानसभा से भाजपा विधायक के भतीजे ने एक संभवतः खनिज या खाद्य अधिकारी के साथ मारपीट की थी और उस अधिकारी को अपना केस वापस लेना पड़ा था।
नये साल के आगमन में जिन दर्जनभर से ज्यादा परिवारों को जिंदगी भर रोने का दर्द मिला है उसके लिए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, नगरीय विकास मंत्री, सांसद, विधायक तो अपना पल्ला झाड़ कर दूर खड़े होंगे क्योंकि इनकी कोई प्रत्यक्ष: जिम्मेदारी बनती नहीं है। और शायद इसीलिए पिछले 10 सालों से हर साल की शुरुआत में देशवासियों को मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखाने और आसमान से तारे तोड़ लाने जैसी लफ्फाजियां सुनाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रख कर चुप्पी साध ली है। प्रदेश के मुख्यमंत्री जिन्हें पर्ची मुख्यमंत्री कहा जाता है मोहन यादव में तो इतना साहस है नहीं कि वे अर्बन डवलपमेंट मिनिस्टर कैलाश विजयवर्गीय से इस्तीफा मांग सकें और ना ही कैलाश विजयवर्गीय में इतना नैतिक साहस है कि वो नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दें। मगर इस घटना से सीधे जनप्रतिनिधि के तौर पर जुड़े महापौर पुष्प मित्र भार्गव और पार्षद कमल वाघेला क्या अपने पद से इस्तीफा देंगे ? शायद नहीं क्योंकि मोदी राज में ना तो जिम्मेदारी लेने का चलन है ना ही इस्तीफा देने का चलन है, चाहे कितनी भी बड़ी घटना घट जाए। कितने भी लोग मर जाएं। अगर मोदी राज में जिम्मेदारी लेने और इस्तीफा देने का चलन होता तो खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का इस्तीफा कई बार हो चुका होता।
बहरहाल अब बारी आती है प्रशासनिक अधिकारियों की जिसमें पहला नाम है निगम आयुक्त दिलीप यादव का। जिन्होंने ना केवल गंदे पानी की शिकायत को नजरअंदाज किया बल्कि पाइप लाइन टेंडर प्रक्रिया पर भी नजर नहीं रखी। यानी पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम कोलैप्स कर गया। दूसरा नम्बर आता है अपर आयुक्त रोहित सिसोदिया का जिन्होंने अगस्त में हो चुकी टेंडर प्रक्रिया को रोक कर रखा। जल प्रभारी बबलू शर्मा ने लगातार दूषित पानी सप्लाई होने के बाद भी कोई ध्यान नहीं दिया। इसी कड़ी में नाम आता है संजीव श्रीवास्तव का जिनने गंदा पानी आने के बाद भी लीकेज खोजने का कोई प्रयास नहीं किया। ऐसा ही आरोप उपयंत्री शुभम श्रीवास्तव पर है जिस जोन नंबर फोर पर मौत हुई वहां पर दूषित जल का निराकरण करना था नहीं किया गया। हेल्पलाइन नंबर 311 पर जो शिकायत आती है उसको आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाल रहे सहायक यंत्री योगेश जोशी पर भी अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं निभाने का आरोप है। अब होगा यह कि दिलीप यादव, रोहित सिसोदिया, बबलू शर्मा, संजीव श्रीवास्तव, शुभम श्रीवास्तव, योगेश जोशी में से जो कमजोर कड़ी होगी उसे तोड़ दिया जायेगा या फिर किसी दूसरी कमजोर कड़ी को ढूंढा जायेगा। यानी बड़े मगरमच्छों को बचाने के लिए किसी छोटी मछली की बलि दी जायेगी। सवाल यह है कि जो पूरे सर्विलांस के तौर तरीके हैं वो क्या फ्रॉड हैं या फिर कागज पर दिखाये गये हैं ? क्योंकि इंदौर में ही पब्लिक सेफ्टी, सिक्योरिटी, वाटर सप्लाई और वाइब्रेंट पब्लिक स्पेसेस में जो खर्च हुआ वह 3 हजार करोड़ के आसपास है। यह केवल समझने की बात है कि खर्चा कहां हुआ, उस पैसे को कौन ले गया। क्योंकि वहां के रहवासी जो अर्बन डवलपमेंट मिनिस्टर हैं एक वक्त मेयर, एमएलए, एमपी भी रहे हैं। कैलाश विजयवर्गीय जब उस मोहल्ले में पहुंचे जहां मौत ने तांडव किया है तो मोहल्ले की महिलाओं ने उनके सामने शिकायतों का अंबार तो लगाया ही अपने गुस्से में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, एमपी, एमएलए, मेयर, पार्षद सबको एक ही धागे में लपेट लिया।
25 जून 2015 को प्रधानमंत्री ने 10 साल के भीतर देश के अलग - अलग अंचलों में 100 स्मार्ट सिटी बनाने का ऐलान किया था और 10 साल पूरा होते ही 25 जून 2025 को देश के अर्बन डवलपमेंट मिनिस्टर हरदीप पुरी ने सामने आकर जानकारी दी कि देश में 100 स्मार्ट सिटी बन गई हैं और इस लिस्ट में मध्यप्रदेश का इंदौर शहर भी शामिल है। इससे एक दिन पहले यानी 24 जून 2025 को पीएम मोदी ने भी अपनी बात रखी और उस जानकारी को बकायदा सरकारी बेबसाइट पर लोड भी कर दिया। पीएम मोदी ने कहा कि 100 स्मार्ट सिटी दरअसल देश के भीतर एक चाबी है, की रोल अचीवमेंट है वह 2047 में होने वाले विकसित भारत की एक पहचान है। देश में जो स्मार्ट सिटी बनाने की परिकल्पना थी उसमें पहली प्राथमिकता तो यही थी कि सबको स्वच्छ पानी मिलेगा। स्मार्ट सिटी में तो भारत की राजधानी दिल्ली को भी शामिल किया गया है लेकिन दिल्ली की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। वहां तो ना साफ पानी है ना साफ हवा, सफाई तो भूल ही जाईये ये किस चिड़िया का नाम होता है। इंदौर शहर को तो पहले 20 शहरों की लिस्ट में ही शामिल कर लिया गया था स्मार्ट सिटी बनाने के लिए। मोदी सरकार ने इस दस बरस की यात्रा में स्मार्ट सिटी का खूब ढिंढोरा पीटा। उसके साथ ढ़ेरों प्रोजेक्ट जोड़ दिए गए, 164000 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए और मान लिया गया कि स्मार्ट सिटी बन गई। इसी तर्ज पर इंदौर को भी स्मार्ट सिटी मान लिया गया जो कई सालों से देश भर में स्वच्छता को लेकर पहले पायदान पर खड़ा हो रहा है। वहीं पर जब स्वच्छ और गंदे पानी का संगम हुआ और उसे पीकर एक दर्जन से अधिक लोग परलोक सिधार गए और लोगों ने मौत की कीमत दे रही सरकार को यह कहते हुए झटकार दिया कि नहीं चाहिए कोई मुआवजा राशि।
प्रधानमंत्री ने जब देश को एक शहर में तब्दील करने की कल्पना की और उसे अमल में लाने के लिए देश के भीतर लूट की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ एक ही पालिटिकल पार्टी के नुमाइंदों की मौजूदगी में होती चली गई, वह अपने आप में भारत के माथे पर लगा अमिट धब्बा बन गया है। स्मार्ट सिटीज में बकायदा एक इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर है। यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट के जरिए एक ऐसा मैनेजमेंट है जिससे किसी हालत में शहर में कोई भी परेशानी हो ही नहीं सकती है। बावजूद इसके इंदौर के जोन नंबर चार में नाले का गंदा पानी टैप वाटर के साथ गलबहियाँ डाले आया, लोग पीते चले गए और मौत भी आती चली गई। स्मार्ट सिटी, प्रधानमंत्री की परिकल्पना और 2047 में विकसित भारत बनाने की सोच को केन्द्र में रखकर देखा जाय तो यहां पर सब कुछ बेहतरीन होना चाहिए क्योंकि बकायदा कहा गया है कि हमने स्मार्ट रोड़ें बनाई हैं, साइकिल ट्रैक बनाये हैं, बाथरूम बनाये हैं, हेल्थ सेंटर बनाए हैं यानी हमने कुल मिलाकर एक ऐसी व्यवस्था की है जिसमें पानी, बिजली, सड़क सब स्वच्छ तरीके से उपलब्ध हो जाय हालांकि भारत की राजधानी दिल्ली में ये चीजें उपलब्ध नहीं हैं फिर भी जिन 100 स्मार्ट सिटी बनकर खड़ी होने की बात अर्बन डवलपमेंट मिनिस्टर द्वारा कही जा रही है और इसमें 164000 करोड़ खर्च हो चुके हैं, 755 प्रोजेक्ट पूरे हो गए हैं उसकी पोल पट्टी 2025 ने बिदाई लेने के पहले खोलकर रख दी है। इससे ज्यादा त्रासदी और क्या हो सकती है ?
कमाई और लूट का गठजोड़ इसलिए बन जाता है क्योंकि जिन मंत्रियों और नेताओं के हिस्से में यह सारी चीजें आती हैं वह कुछ लोगों को जमा करते हैं, कुछ कंपनियों को बुलाते हैं और उनके आसरे उस स्मार्ट सिटी में कुछ कीलें ठोंक दी जाती हैं। वह कील कम्युनिकेशन, बेहतरीन सड़कों-दीवारों, टैप वाटर की हो सकती है तो फिर सहज समझा जा सकता है कि खर्च होने वाला पैसा कहां जा रहा है। हकीकत यह है कि मोदी सरकार द्वारा जिन भी योजनाओं का ऐलान किया जाता है उसके बजट का ज्यादातर हिस्सा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो चस्पा कर प्रचार प्रसार करने के लिए विज्ञापन की तर्ज पर खर्च कर दिया जाता है। राम तेरी गंगा मैली को साफ करने के लिए जो बजट एलाट किया गया उसका भी ज्यादातर हिस्सा पीएम मोदी की फोटो लगाकर विज्ञापन की तर्ज पर खर्च कर दिया गया और राम की गंगा आज भी मैली की मैली ही है। इतना ही नहीं है जो प्रोजेक्ट चलते हैं उनमें अलग - अलग मंत्रालय की हिस्सेदारी भी होती है और हर मंत्रालय अपने तौर पर पीएम मोदी की फोटो चस्पा कर प्रचार प्रसार करता है। सरकार का ही आंकड़ा बताता है कि बीते 10 बरसों में तकरीबन 27 लाख करोड़ रुपये पीएम मोदी की फोटो लगे विज्ञापन रूपी प्रचार प्रसार करने में फूंक दिए गए हैं। शहरों को लेकर पांच बड़ी योजनाएं चल रही हैं जिनमें शामिल है स्वच्छ भारत अभियान, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्मार्ट सिटी मिशन, अमृत योजना और दीनदयाल राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन।
इसके अलावा देश में मोदी सरकार द्वारा पिछले 10 सालों से चलाई जा रही योजनाओं की लंबी फेहरिस्त है जिसमें राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, कृषोन्नति योजना, राष्ट्रीय आयुष मिशन, एनएफएसए के अंतर्गत खाद्यान्नों को राज्य के भीतर लाने - ले जाने के लिए राज्य एजेंसियों को सहायता और एफपीएस डीलरों का मार्जिन, समग्र शिक्षा, प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण, राज्यों में अध्यापन शिक्षण परिणामों का सुध्द्रीकरण, प्रधानमंत्री स्कूल फार राइजिंग इंडिया, प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, पशुपालन और डेयरी को लेकर विकास कार्यक्रम, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण, आयुष्मान भारत योजना, पीएमई बस सेवा स्कीम, नदियों को आपस में जोड़ना, ग्राम स्वराज अभियान, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम, ग्राम सड़क योजना, नई आईआईटी उन्नयन योजना, अनुसूचित जाति अभ्यद योजना, सक्षम आंगनबाड़ी, फसम बीमा योजना, मिशन दलहन, मिशन फल और सब्जी, मिशन कपास तकनीकी और इन सबके बीच खाद्य सब्सिडी भी दी जा रही है। इसके अतिरिक्त इसमें मेट्रो परियोजना, अटल भूजल परियोजना, नये रोजगार सृजन संबंधी योजना, ई - न्यायालय जैसे लगभग 175 नामों के साथ ही खेलो इंडिया को भी इस लिए जोड़ लेना चाहिए क्योंकि आने वाले समय में गुजरात के अंदर खेलो इंडिया एक नये तरीके से दिखाई देने वाला है। इनमें सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर चुकी है, आगे भी करोड़ों रुपये खर्च करेगी। करोड़ों रुपये पीएम मोदी की तस्वीर लगाकर प्रचार प्रसार करने में उड़ाये जायेंगे। योजनाओं और प्रचार - प्रसार पर खर्च होने वाला पैसा देश के टैक्स पेयर के खून पसीने की कमाई का पैसा है। देशवासी ना तो योजनाओं को चलाने वाले मंत्रालय को जानते हैं ना ही उस मंत्रालय के कैबिनेट मिनिस्टर को वे तो केवल और केवल प्रधानमंत्री को जानते हैं जिनकी फोटो चस्पा कर विज्ञापन की तर्ज पर प्रचार - प्रसार किया जाता है। देश के भीतर वन टू फोर जो भी गवर्नेंस के तौर तरीके हैं उस पर एक ही पालिटिकल पार्टी का कब्जा है। जैसा कि इंदौर में हुई मौतों के दौरान सामने आया इसीलिए सबने खामोशी बरत ली है। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हर उन मुद्दों पर चुप्पी साध लेते हैं जो जनता से जुड़े हुए होते हैं। देश को भरमाने के लिए 2047 के विकसित भारत का सपना सामने रख दिया जाता है।
लोकतंत्र की दुहाई देकर अक्सर कहा जाता है कि राजनीतिक सत्ता के विकास कामों पर विपक्षी पार्टियां अडंगेबाजी करती हैं। राज्य में अगर केन्द्रीय पार्टी से हटकर दूसरी पार्टी की सरकार है तो टकराव होता रहता है। यानी एक हिस्सा तो यही है कि राजनीतिक तौर पर पार्टियां आपस में टकराती हैं और विकास कार्य प्रभावित होते हैं। लेकिन यही लोकतंत्र है। दूसरा हिस्सा यह कि अगर सत्ता पार्टी पर अंकुश लगाने के लिए विपक्ष ना हो तो फिर लूट जबरजस्त होती है। एक बेहतरीन नेक्सस के सहारे सब्जबाग दिखाये जाते हैं और बजट का पूरा पैसा अपने लोगों के बीच बंदरबांट कर लिया जाता है या फिर एक ऐसा सिस्टम बना दिया जाता है कि जिसको भी लाभ मिल रहा है वह सत्ता के साथ रहेगा, करीब रहेगा। एक तरफ लोकतंत्र है, दूसरी तरफ तानाशाही है। एक तरफ बेहतरीन देश बनाने की सोच है, दूसरी तरफ लूट है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नये बरस की भोर में कुछ नहीं कह रहे हैं। हर बरस के शुरू में पिछले ग्यारह बरसों से देश सब्जबाग देखता - सुनता आ रहा है। लेकिन आज वह कुछ कह नहीं पा रहे हैं क्योंकि मध्यप्रदेश के इंदौर शहर (स्मार्ट सिटी) में जो दर्जन भर से ज्यादा मौतें साफ पानी ना मिलने से हुई हैं, दो सैकड़ा से अधिक हास्पिटल में इलाजरत हैं उसमें भी आधा दर्जन के लगभग गंभीर हालत में हैं। ऐसा नहीं है कि मोहल्ले के लोगों ने शिकायत नहीं की। बकायदा शिकायत की लेकिन अनसुनी कर दी गई क्योंकि कोई दूसरी आवाज नहीं थी। इसके साये में उनका ही यानी बीजेपी का ही मेयर, पार्षद, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री यहां तक कि वे खुद (प्रधानमंत्री) भी हैं।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार


