संपादकीय। भारत दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है और 2030 तक तीसरी अर्थव्यवस्था बन जायेगा इसकी मुनादी सरकार ने सरकार ने 2025 की बिदाई बेला के पूर्व कर दी लेकिन सरकार चौथी अर्थव्यवस्था के भीतर का दर्द बयाँ करने से डरती है। इन ग्यारह सालों में भारत की कमाई घटकर 2013 से नीचे आकर खड़ी हो गई है। यानी जो कमाई देश की मुद्रा स्फीति और मंहगाई के साथ जुड़ती है वह नीचे आ गई है। लेकिन सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है वह तो ढिंढोरा और बाजीगरी दोनों दिखाती है। देश के 90 फीसदी लोगों की प्रति व्यक्ति आय उन अफ्रीकी देशों की कतार में जाकर खड़ी हो जाती है जहां प्रति व्यक्ति आय 1 लाख रुपये से भी कम है। देश की सामाजिक परिस्थितियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान बनाई है भारत से जाने वाले उन लोगों की संख्या जो करोड़ों के पार है जो रोजगार के लिए देश से निकल जाते हैं। इस मामले में भारत चीन से भी आगे है। यानी देश में रोजगार के अवसर नहीं हैं। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, यूरोपीय यूनियन कंट्रीज हर देश के भीतर भारत की सामाजिक परिस्थितियों की झलक दिखाई देती है लेकिन वह 2014 के पहले वाली तस्वीर से धुंधली हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान उस निशानदेही के साथ है कि भारत में सर्वधर्मसमभाव गायब हो चुका है। भारत को छोड़ने वाले रईसों की संख्या में इतना इजाफा हो चुका है कि दुनिया के तमाम देशों से जाने वाले रईसों को जोड़ा जाय तो 100 बिलेनियर्स में से 60 बिलेनियर्स भारत के होते हैं। जो भारत को छोड़ कर दूसरे देशों में जाकर दो दूना पांच करते हैं या फिर वहां पर रह कर भारत को और ज्यादा गवर्नमेंट नेक्सेस के आसरे लूट रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान उस भूख से भी जुड़ी हुई है जो भूख गरीब कल्याण अन्न योजना चलाकर वाहवाही लूट रही है कि हम 5 किलो अनाज मुफ्त दे रहे हैं। ठीक इसी तर्ज पर आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक, एशियन डवलपमेंट बैंक तथा विकसित देशों के बैंक भारत को भी उसी तर्ज पर आर्थिक मदद देती है जिस तर्ज पर भारत गरीबों को 5 किलो अनाज देता है।
कर्जा लेने के मामले में भारत दुनिया के तमाम देशों की कतार में पहले नंबर पर खड़ा हुआ है। देश के भीतर की सियासत का ताना-बाना पहली बार नफरत, हमले से जुड़ा हुआ है। हमले भी उस तरह के जो पहले कभी देखे नहीं गए। देश की परिस्थितियां खुलेआम इजहार करती हैं कि देश की राजनीतिक सत्ता अब चाह कर भी लिबरल नहीं हो सकती है। दुनिया भर के अखबार भारत के गवर्नेंस के ताने-बाने को छापने से परहेज नहीं कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की पहचान वैचारिक और विचारधारा को लेकर तानाशाही के रूप में बन रही है। वैचारिक तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस रूप में रेंगने लगी है जो इससे पहले कभी नहीं थी। ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ नकारात्मक ही है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। भारत में मौजूदा रईसों की तादाद यूरोप के कई रईसों को पीछे छोड़ देती है। भारत के ऊपर जो कर्ज का बोझ है वह दुनिया के कई देशों से आगे बढ़ चुका है। आने वाले समय में भारत एक ऐसे देश के तौर पर सबसे आगे खड़ा नजर आयेगा जिसकी इकाॅनामी, जिसका बाजार, खर्च करने की व्यवस्था और उस खर्च के आसरे सबसे आगे खड़े होने की सोच बनती है। दुनिया भर के करीबन एक दर्जन देशों के साथ भारत फ्री ट्रेड की दिशा में जुड़ चुका है। लेकिन दुनिया में जहां सबसे पहले नये साल की शुरुआत होती है न्यूजीलैंड वहां की राजनीतिक सत्ता के भीतर का कशमकश यह है कि वहां सत्ता को सहयोग करने वाली पार्टी कह रही है कि भारत के साथ फ्री ट्रेड खत्म करिए।
2025 का बही-खाता बताता है कि दुनिया पूरे तरीके से बदल गई है। 2025 की जनवरी के महीने में वाशिंग्टन में क्वाड की बैठक विदेश मंत्रियों के बीच हो रही थी जिसमें भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान के विदेश मंत्री मौजूद थे लेकिन चीन ने विरोध किया था। संयोग देखिए 2025 के आखिरी महीने दिसम्बर के अंतिम दिनों में चीन के बीजिंग शहर में क्वाड को लेकर राजदूतों की बैठक हुई। जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के राजदूत उपस्थित थे। यानी चीन की राजधानी में क्वाड के राजदूतों की बैठक होती है और चीन विरोध नहीं कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शपथ लेने के साथ ही भारत के साथ उसके रिश्ते कैसे रहेंगे इसकी तस्वीर साफ हो गई थी। भारत और अमेरिका के रिश्ते कैसे आगे बढ़ेंगे आज तक उलझे हुए हैं। टेरिफ का रास्ता अटका हुआ है। इसीलिए डाॅलर की कीमत बढ़ रही है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत कर्ज में डूबता चला जा रहा है। इसीलिए रूपये को बचाने के लिए डाॅलर बेचे जा रहे हैं। भारत को 2025 में लगभग साढ़े तीन लाख करोड़ के डाॅलर बाजार में बेचने पड़े हैं। लेकिन इस तस्वीर का एक हिस्सा भारत के भीतर अमेरिका की दखलंदाजी का भी है जहां अमेरिका कहता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर उसने करवाया है। अब तो चीन ने भी कह दिया है कि हम ना होते तो भारत और पाकिस्तान युद्ध में और उलझ जाते।
चीन, चीन के हथियार, चीन के युद्धक विमान पाकिस्तान के साथ खड़े हैं। भारत चीन के कच्चे माल पर निर्भर है। चीन और रशिया एक साथ खड़े हैं। भारत ने अब रशिया से तेल लेना कम कर दिया है क्योंकि अमेरिका ने पाबंदी लगाई हुई है। सवाल लाजिमी है कि भारत खड़ा कहां पर और किसके साथ है ? ना तो वह अमेरिका के साथ है ना ही खुलकर रूस के साथ है कि उसके साथ अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने की दिशा में बढ़ जाए। ना ही वह चीन के साथ है लेकिन निर्भरता है। ना ही मिडिल ईस्ट, ईरान या इजराइल के साथ खड़ा है। रूस और अमेरिका टकरा रहे हैं, रूस और यूक्रेन में युद्ध हो रहा है, चाइना और अमेरिका टकराते हैं, ब्रिक्स को लेकर अमेरिका चेता रहा है खबरदार कोई नई करेंसी लेकर मत आना, इजराइल और ईरान टकरा रहे हैं। फिलिस्तीन को लेकर, गाजा पट्टी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं और भारत हर किसी के साथ खड़ा है यानी दुनिया में भारत इस दौर में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और विदेश नीति तथा अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए एक मैजिक पायदान पर खड़ा हो गया है। एक समय जिस गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुवाई भारत करता था उस गुटनिरपेक्ष आंदोलन को 2014 में प्रधानमंत्री बनते ही नरेन्द्र मोदी ने तिलांजलि दे दी थी। सितम्बर 2014 में पीएम मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देते हुए टेररिज्म को लेकर सवाल खड़े किए थे। तब अमेरिका के स्वर भी मिल रहे थे लेकिन आज अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा है। तय नियमों के मुताबिक क्वाड की बैठक दिसम्बर में भारत में होनी थी लेकिन ट्रंप ने आने से मना कर दिया। उस क्वाड की बैठक को राजदूतों की बैठक में तब्दील कर बीजिंग में बैठक कर ली गई और भारत मना नहीं कर पाया। भारत मिडिल ईस्ट, ईरान, इजराइल, रशिया, अमेरिका, चीन के साथ है यानी सबके साथ है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत के साथ कौन - कौन देश हैं ? भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश में कौन भारत के साथ खड़ा है ? उनकी आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियां भारत के साथ कितनी जुड़ी हुई है ?
2025 में भारत के भीतर जिस तरीके से सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को लेकर राजनीतिक ताना-बाना बुना गया। उसके दायरे में समाज भी आया और देश का बाजार भी आया। देश के भीतर गरीबी और रईसी के बीच की खाई और ज्यादा चौड़ी हो गई है। सोने और चांदी के भाव आसमान छू रहे हैं यानी आम आदमी के लिए सोना-चांदी चंदामामा हो गये हैं। रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों की कीमतें भी हनुमान की पूंछ की तरह बढ़ती जा रही हैं। सैंया जो कमात हैं सब मंहगाई डायन खाये जात है। रईसों ने बैंकों से कितना कर्जा लिया है और कितना लौटाया है। सरकार ने कितना रिटेन आफ किया है और बैंकों की बैलेंस सीट ठीक करने के लिए कितना पैसा दिया है ? 25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा दिये हैं सरकार ने। देश में जितनी योजनायें चल रही हैं उन योजनाओं के प्रचार प्रसार में बजट का लगभग 13 फीसदी खर्च कर दिया गया है। देश में लोकतंत्र को जिंदा रखने की जिम्मेदारी जिस लोकतांत्रिक संस्था के पास है वही संस्था चुनाव आयोग सवालों के दायरे में आ गया है। तत्कालीन सीईसी राजीव कुमार के दौर में मशीन (ईवीएम) पर ऊंगली उठ रही थी लेकिन वर्तमान सीईसी ज्ञानेश कुमार ने तो एक कदम आगे बढ़ाते हुए वोटर लिस्ट को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। देश के सीजेआई पर सुप्रीम कोर्ट के भीतर ही जूता फेंका गया। सीजेआई ने कार्रवाई करने में कायरता दिखाई जिसे संयम के आवरण में ढंक कर पेश कर दिया गया। देश के हर मुद्दे पर खामोश रह जाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सीजेआई की खामोशी की तारीफ कर दी। देश के प्रधानमंत्री को कब, कहां, कितना बोलना है यह संविधान तय नहीं करेगा। संविधान को ही विवादों के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया गया है। जहां देश की जनता को मिलने वाले संवैधानिक अधिकार छीन लिए गए हैं।
2025 में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जहां राजनीतिक सत्ता की राजनीति पहुंची ना हो। राजनीतिक सत्ता की सोच, धारा, विचारधारा पहुंची ना हो। बालीवुड से लेकर खेल के मैदान तक कोई भी अछूता नहीं रहा। एक समय था जब कहा जाता था कि फिल्में समाज का आईना होती हैं। यह सोच कब गायब हो गई किसी को पता ही नहीं चला। कैसे धीरे - धीरे बालीवुड सरकार की फाइलों में दफन हो गया और फाइलों से निकलने वाले स्क्रिप्ट स्क्रीन पर रेंगने लग गये किसी को पता ही नहीं चला लेकिन तालियां बजती रहीं, बिजनेस होता रहा। देश की इकाॅनामी बढ़ती रही और 2025 आकर हमारी चौखट पर खड़ा हो गया बिदाई लेने के लिए। हर पहली सीढ़ी दूसरी सीढ़ी पर चढ़ने का आधार होती है या यूं कहें एक सीढ़ी दूसरी सीढ़ी की सहायक होती है तो 2025 में जो बाजीगरी चलती रही, जो ढिंढोरा पीटा जाता रहा और अब जब सामने आकर 2026 खड़ा हो गया है तो तय है कि 2025 की पोटली लेकर ही सरकार 2026 की सीढ़ी चढ़ेगी। जश्न ज्यादा होगा। कुछ नये मुद्दों का जन्म होगा।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार


