दिव्यांशू मिश्रा अंशु की कलम से…
कटनी। पिछले दिनों मेरी मुलाकात सोनम वांकचुक से हुई श्री वांकचुक एक ख्याति प्राप्त इंजीनियर, प्रकृति प्रेमी, सच्चे राष्ट्र भक्त और भारत माता के सपूत तो है ही इसके साथ शिक्षा सुधारक, जिन्होंने भारतीय सेना को पहाड़ियों की ठंड से बचाने के लिए सोलर हाउस जैसे अनेकों आविष्कार किए, मुख्य रूप से उन्हें शिक्षा प्रणाली में नवाचार (इनोवेशन)और टिकाऊ विकास के लिए जाना जाता है। वे SECMOL (स्टूडेंट्स ' एडुकेशन एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ़ लद्दाख ) के संस्थापक हैं और 'आइस स्तूप' (कृत्रिम ग्लेशियर) तकनीक के आविष्कारक हैं। इनका यह स्कूल में स्वयं कुछ वर्ष पहले देख कर आया हूँ जिसने मुझे काफ़ी प्रभावित किया था। मशहूर कलाकार आमिर ख़ान की फ़िल्म “थ्री इडियट्स” जिसने ब्लॉकबस्टर में काफ़ी धूम मचाई थी और लोगो को वह काफ़ी पसंद आयी थी,
वाह फ़िल्म भी श्री वांकचुक पर बनी थी। पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया पर देखता था की सोनम वांकचुक लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची को लेकर आंदोलनरत थे। उनका यह आंदोलन अनवरत चल रहा था ऐसी महान शख्सियत जिन्होंने सेना को ठंड से बचाने के लिए अविष्कार किए अनेकों प्रयास किए। देश का नाम वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध किया उस पर NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा एक्ट 1980) लगाकर लद्दाख जैसे ठंडे प्रदेश में रहने वाले व्यक्ति को जोधपुर की गर्म जेल में बिना किसी अपराध या किसी ठोस प्रमाण के भेज दिया गया। एक सभ्य समाज से आने वाले पढ़े-लिखे व्यक्ति सोनम वांकचुक को सरकार की तानाशाही ने लगभग छह माह जेल में रखा।
उस दौरान उनके और परिवार के साथ देश के ख्यातिप्राप्त अधिवक्ता समाजसेवी राज्यसभा के सदस्य विवेक तनखा ढाल बनकर परिवार के साथ खड़े रहे। सतत अदालत एवं अन्य स्तर पर उन्होंने श्री वांखचुक की रिहाई के प्रयास किए,या कहा जाये तो उनकी रिहाई पर श्री तनखा का अहम योगदान है। हर समय आंदोलन से लेकर जेल तक के सफर में श्री वांकचुक की धर्मपत्नी गीतांजलि एंग्मो ने भी अदम्य साहस का परिचय दिया और कंधे से कंधा मिलकर इस दमनकारी चक्र के ख़िलाफ़ डटकर मुकाबला किया। सोनम वांकचुक ने जेल से निकलने के बाद श्री तनखा के आवास पर हुई पत्रकार वार्ता में जो कहा वो प्रेरणादायी है और आज के नौजवानों को उससे सीख भी लेनी चाहिए। उनके चहरे में बदले और प्रतिशोध जैसा कुछ देखने को नहीं मिला। बड़ी सरलता से बेबाक़ अंदाज़ में कहा कि मैंने सरकार से स्पष्ट कहा कि मुझे जेल से भले सालों मत छोड़ो पर में अपनी रिहाई पर किसी शर्त को मंजूर नहीं करूँगा। उन्होंने मुस्कुराकर कहा कि जीवन में सभी को एक बार जेल जाना चाहिए, उसका मतलब ये भी है कि हर एक को अपना हाँथ और सर उठाना चाहिए किसी मुद्दे को लेकर, देशद्रोही बताकर किसी को जेल भेजना और फिर अपने फ़ैसले को वापस लेकर बिना शर्त जेल से रिहा करना यह दर्शाता है कि सरकार से भूल हुई।
बहुत भयावह था अचानक एक अपराधी की तरह मुझे जेल भेजना वहा से मैं अपना पक्ष भला कैसे रख सकता। सोनम शुरू से सरकार से सिर्फ संवाद चाहते थे,मुद्दे की लड़ाई लड़ने वाला भला देश द्रोही कैसे हो सकता है। क्या आज भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी की इतनी बड़ी सज़ा मिल सकती है? सोनम वांकचुक ने मामले ने देश के तमाम आंदोलनकारियों को जगा दिया या कहे तो कुछ को डरा दिया। उनसे मिलकर बेहद सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ, ऐसा लगा जैसे किसी शक्ति के पुंज को स्पर्श किया हो,जैसे में आज़ाद भारत के भगत सिंह से मिला। उनसे प्रेरणा लेकर जरूर देश का युवा समाज में सकारात्मकता के साथ बदलाव और विकास की लड़ाई का हिसा बनेगा।


