खरी-अखरी(सवाल उठाते हैं पालकी नहीं)
कटनी। वैसे तो पत्रकारों की दो ही नस्ल होती है। एक वो जो सवाल छेड़ते हैं, दूसरे वो जो सवाल करते हैं। लेकिन एक नई नस्ल भी पैदा हो चुकी है जो सवालों से वैसे ही डरती है जैसे नेता चुनाव के पहले किए गए चुनावी वादों के सवाल से डरता है। ये वो पत्रकार हैं जो हर प्रेस कांफ्रेंस में खबर ढ़ूढ़ने नहीं अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए जाते हैं। इनकी पत्रकारिता माइक से कम सेल्फी से ज्यादा चलती है। पत्रकार का काम नेता से हाथ जोड़कर सवाल मांगना नहीं होता है। पत्रकार पहले सबूत जुटाता है, दस्तावेज खंगालता है, लोगों की शिकायतें सुनता है, धूल और धूप में भी धक्के खाता है और फिर खबर लिख या दिखा देता है। उसके बाद जनता सवाल करती है।
असली पत्रकार कभी भी सत्ता के सामने विनती नहीं करता है कि सर, एक सवाल पूछना है ? उसका लिखा हुआ सच ही सबसे बड़ा सवाल बन जाता है। उसकी खबर से वर्षों से कचरे से सनी सड़कें साफ होने लगती हैं। जिन सड़कों के गड्ढों में जनता सरकार को खोज रही होती है, वहां रातों-रात डामर बिछने लगता है। दफ्तरों में धूल से अटी पड़ी फाइलें खंगाली जाने लगती है, मीटिगों का दौर शुरू हो जाता है। ऐसा लगने लगता है जैसे खबर नहीं छपी बल्कि किसी संत ने आकर प्रशासन में प्राण-प्रतिष्ठा कर दी हो। नेता खुद-ब-खुद प्रेस कांफ्रेंस करने लगते हैं।
लेकिन वर्तमान में प्रेस कांफ्रेंस लोकतंत्र का कार्यक्रम कम सत्ता का सांस्कृतिक उत्सव ज्यादा लगता है। नेता मंच पर ऐसे बैठते हैं जैसे देश ही नहीं ब्रम्हांड भी उनके भरोसे चल रहा है। पीछे पार्टी का भारी भरकम बैनर, सामने कैमरों का जमघट और बीच में नेता का चेहरा ऐसे चमकता है मानो विकास खुद फेशियल कराकर आया हो। फिर शुरू होती है नेता की रामकथा। हमने ये किया - हमने वो किया। विकास को इतनी नाटकीयता के साथ परोसा जाता है कि हकीकत हवा हवाई हो जाती है। नेता बताता रहता है और पत्रकार ठीक उसी प्रकार से सिर हिलाता रहता है जैसे किसी धार्मिक कथा में प्रवचन सुन रहा हो। फर्क सिर्फ इतना होता है वहां प्रसाद मिलता है यहां प्रेस नोट और कभी कभार द्रव्य-दक्षिणा। फिर सवाल भी वैसे ही होते हैं जैसे नेता ने निर्देशित किए हैं यानी पत्रकार को सवाल पूछने की उतनी ही रियायत मिलती है जितनी सरकारी फाइल से आम आदमी की पहुंच और वैसा ही छपता है जैसा नेता ने बोला है। चरण चुंबन करने वाले पत्रकारों के सवाल भी ऐसे होते हैं कि पत्रकारिता शर्म से जमीन में गड़ने के लिए जगह तलाशती दिखती है। सर, आपकी लोकप्रियता का राज क्या है ? सर, विपक्ष आपके विकास से घबराता क्यों है ? सर, आप इतनी ज्यादा मेहनत कैसे कर लेते हैं ? ऐसा लगता है जैसे प्रेस कांफ्रेंस नहीं नेता के विवाह के लिए परिचय सम्मेलन हो रहा हो।
सत्ता को कटघरे में खड़ा करने वाले पत्रकार को माइक नहीं मिलता क्योंकि सत्ता को सवाल पसंद नहीं है, सत्ता को व्यवस्था पसंद होती है। सवाल हमेशा व्यवस्था को बिगाड़ता है। असली पत्रकार और उसकी पत्रकारिता हमेशा सत्ता को असहज करती है। इसीलिए आजकल नेताओं ने पत्रकार नहीं फ्रेंडली मीडिया पालना शुरू कर दिया है। पत्रकारों का ईमान ईमानदारी की जगह मैनेजमेंट हो गया है। कौन नेता फोन उठाता है, कौन अफसर पहचानता है, किसके साथ चाय पी जा सकती है, किसके हैलीकॉप्टर बैठा जा सकता है। पत्रकार इसी को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानने लगे हैं।
पहले पत्रकार सत्ता के सामने खड़ा होकर सवाल पूछता था आज सत्ता पत्रकार को सामने खड़ा करके तय करती है कि उसे क्या और कितना पूछना है। अगर पत्रकार ने धोखे से तीखा सवाल पूछ लिया या विपक्ष के नेता द्वारा लगाए गए आरोपों को जस का तस छाप दिया तो अगले दिन से सत्ता के कार्यक्रम में उसका प्रवेश निषेध। यहां तक कि उसका अपहरण कराकर प्रशासन के जरिए वो सब कुछ किया जा सकता है जो दुर्दांत अपराधियों के साथ भी नहीं किया जाता है। यानी लोकतंत्र में सवाल पूछना धीरे-धीरे अपराध की श्रेणी में शामिल किया जाने लगा है। सबसे बड़ा मजाक तो तब होता है जब नेता मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहता है और चौथे स्तम्भ के असली पहरेदार को माइक तक पहुंचने के रोका जाता है। अब तो ऐसा प्रतीत होता है कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ बचा ही नहीं है केवल सजावटी खम्बे रह गए हैं जिन पर सत्ता पार्टी के बैनर पोस्टर चिपकाये जाते हैं।
आजकल पत्रकार खबर नहीं माहौल बनाते हैं। नेता ने सड़क किनारे खड़े होकर चाय पी ली तो खबर चलने लगती है जननायक आम जनता के बीच । नेता ने पौधा लगा दिया तो पूरा चैनल हरियाली मय हो जाता है। लेकिन अगर पत्रकार ने पूछ लिया कि बीते बरस लगाए गए पौधे सूख क्यों गये ? तो उस पत्रकार को नकारात्मक करार दे दिया जाता है। अब नेताओं द्वारा अपने और अपने परिजनो के जन्मदिन पर रक्तदान शिविर तथा समाज और शासन प्रशासन से सताये हुए अनाथालय में रह रहे बच्चों, वृध्दाश्रम में रह रहे हैं वृध्दजनों को गिफ्ट आदि देने का नाटकीयता भरा आयोजन किया जाने लगा है ।
पत्रकार और दलाल के बीच सिर्फ एक ही फर्क होता है - पत्रकार सवाल उठाता है, दलाल सवाल दबाता है। जो पत्रकार सत्ता से डर जाए, विज्ञापन देखकर झुक जाए, सुविधा देखकर बिक जाए वह पत्रकार नहीं सूचना विभाग का अस्थाई कर्मचारी है। वर्तमान में ऐसे पत्रकार अधिकाधिक दिखने लगे हैं जिनकी पत्रकारिता नेता के जन्मदिन पर केक तक सीमित रहती है और ऐसे पत्रकारों की संख्या सीमित होती जा रही है जो गांव कस्बे की धूल भरी गलियों में खड़े होकर किसानों और आम आदमी की बदहाली लिखते हैं। जिसका फर्क भी दिखता है पहले वाले की तस्वीरें ज्यादा छपती है तो दूसरे वाले की खबर ज्यादा असरदार होती है। सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां पर खबर से ज्यादा थंबनेल बिकता है। ज्यादा चीखना महत्वपूर्ण हो गया है। स्टूडियो में बैठे पत्रकार रोज देश को बचा लेते हैं, विपक्ष को देशद्रोही साबित कर देते हैं और ब्रेक के बाद फेस वास का विज्ञापन भी चला देते हैं। ऐसे पत्रकार भले ही कम संख्या में हों जो सच लिखते हैं, वे प्रेस नोट नहीं छापते, फाइलें पढ़ते हैं, पर्चियों वाले सवाल नहीं पूछते बल्कि जनता के सवाल उठाते हैं। लोकतंत्र चुनावी जीत से नहीं सवालों से जिंदा रहता है। जहां सवाल खत्म हो जाते हैं वहां सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रचार बचता है। इसीलिए पत्रकार दो किस्म के होते हैं। एक वो जो सवाल छेड़ते हैं, दूसरे वो जो सवाल करते हैं। बाकी जो बच जाते हैं वो सिर्फ़ और सिर्फ़ माइक पकड़ते हैं।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार


