प्रयागराज। चर्चित ग़ज़ल संग्रह 'शाम तक लौटा नहीं' से साहित्य प्रेमियों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने वाले वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार डॉ. सोमनाथ शुक्ल एक बार फिर नई रचना के साथ पाठकों के बीच आने को तैयार हैं। उनका बहुप्रतीक्षित दोहा-संग्रह 'श्रम-साधक (युग की प्रतिध्वनि)' शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रहा है। हाल ही में पुस्तक का आकर्षक कवर पेज जारी किया गया, जिसके बाद साहित्यिक जगत में इसे लेकर उत्सुकता और बढ़ गई है।
यह पुस्तक श्वेतवर्णा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही है। संग्रह का केंद्र श्रमिकों का संघर्ष, उनकी पीड़ा, अधिकार और सम्मान है। समाज के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले श्रमवीरों के जीवन की कठिनाइयों और उनके अनदेखे योगदान को डॉ. शुक्ल ने दोहों के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है।
पुस्तक में बाल श्रमिकों के खोते बचपन, विस्थापित किसानों की बेबसी और आधुनिक डिजिटल युग में मशीनों के बीच संघर्ष कर रहे कामगारों की संवेदनाओं को पारंपरिक दोहा-छंद में पिरोया गया है। साहित्यकारों का मानना है कि यह कृति केवल सामाजिक यथार्थ का चित्रण नहीं, बल्कि श्रम की गरिमा और मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का गंभीर प्रयास भी है।
पुस्तक के आवरण से ही इसके विषय की गंभीरता और संवेदनशीलता का आभास होता है। यह संग्रह महानगरों की चकाचौंध के पीछे छिपे श्रमिक जीवन को सामने लाने के साथ-साथ एक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की कल्पना को भी स्वर देता है।
299 रुपये मूल्य वाली यह पुस्तक जल्द ही बाजार में उपलब्ध होगी। प्रयागराज सहित देशभर के साहित्य प्रेमियों और डॉ. सोमनाथ शुक्ल के पाठकों को इसके विमोचन का बेसब्री से इंतजार है। साहित्य जगत का मानना है कि 'श्रम-साधक' समकालीन हिंदी साहित्य में श्रमिक जीवन पर आधारित महत्वपूर्ण कृतियों में अपनी विशेष पहचान बना सकता है।



