देश - दुनिया के पहले प्रधानमंत्री मोदी जिनने बालकों का क्रूरतम तरीके से उपहास उड़ाया
सत्ताधारियों सहित स्पीकर भी पेश करते रहे मानसिक दिवालियेपन का नमूना
बीजेपी और मोदी के लिए हिन्दू कोई धर्म नहीं बल्कि चुनावी खेल खेलने के लिए ताश का पत्ता है!
99 मार्क्स लेकर एक बालक घमंड में घूम रहा था और वो सबको दिखाता था देखो मेरे इतना ज्यादा मार्क्स आये हैं तो लोग भी जब 99 सुनते थे तो शाबासी देते थे उसका हौसला बुलंद करते थे फिर उसके टीचर ने बताया कि यह तो 100 में 99 नहीं 543 में से 99 लाया है। अब उस बालक बुध्दि को कौन समझाये कि तुमने फेल होने का वर्ल्ड रिकार्ड बनाया है। कोई छोटा बच्चा साइकिल लेकर निकला और वो बच्चा गिर जाता है साइकिल से लुड़क जाता है, रोने लगता है तो कोई व्यक्ति आकर उसका मन बहलाने के लिए कहता है कि देखो चींटी मर गई, देखो चिड़िया उड़ गई, तुम तो बहुत बढ़िया साइकिल चलाते हो तुम गिरे नहीं हो। आजकल बच्चे का मन बहलाने का काम चल रहा है। एक बच्चा स्कूल से आया और जोर जोर से रोने लगा उसकी मां भी डर गई क्या हो गया बहुत रोने लगा जोर जोर से रोने लगा और फिर कहने लगा मां आज मुझे स्कूल में मारा गया आज मुझे स्कूल में उसने मारा आज मुझे स्कूल में इसने मारा और जोर जोर से रोने लगा मां परेशान हो गई उसने उससे पूछा कि बेटा बात क्या थी लेकिन वो बता नहीं रहा था बस रो रहा था और मुझे मारा मुझे मारा कर रहा था। बच्चा ये नहीं बता रहा था कि आज स्कूल में उसने किसी बच्चे को मां की गाली दी थी उसने ये नहीं बताया कि उसने किसी बच्चे की किताबें फाड़ दी थी उसने ये नहीं बताया कि उसने टीचर को चोर कहा था उसने ये नहीं बताया कि उसने किसी बच्चे का टिफिन चुरा कर खा लिया था। बालक बुध्दि में ना बोलने का ठिकाना होता है और ना ही व्यवहार का कोई ठिकाना होता है।
उक्त वाक्यांश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस भाषण के हैं जो वे गत दिवस संसद में राष्ट्रपति अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर किस्से - कहानियां सुनाकर दे रहे थे। प्रधानमंत्री के भाषण का स्तर निम्नस्तरीय भी हो सकता है इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की हो। वह इसलिए भी कि मोदी के पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने इस तरह के भाषण सदन में नहीं दिये हैं क्योंकि वे अपने सम्मान से ज्यादा सदन की गरिमा का ख्याल रखते थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण का विश्लेषण राजनीतिक विश्लेषकों के बजाय बाल मनोचिकित्सकों और बाल मानसिकता के विद्वानों को करना चाहिए। उन्हें देखना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन में बालक और उसके बचपन की क्या छवि है। उनकी नजर में बाल बुध्दि का क्या मतलब है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किस तरह से बचपन के मासूम उदाहरणों को राजनीति के क्रूर रूपक में बदल कर पेश कर रहे थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस क्रूरतम तरीके से बालक, बालमन, बालबुध्दि का चित्रण किया है उससे घर परिवारों में माओं - पिताओं और पारिवारिक सदस्यों का बच्चों के प्रति नजरिया बदलने की आशंका बलवती हो गई है। मनोचिकित्सकों को तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी मानसिक परीक्षण करना चाहिए कि कहीं मोदी के मनो - मस्तिष्क में उम्रदराजी हावी तो नहीं हो गई है क्योंकि पीएम मोदी अपने पूरे भाषण में बालक और बालबुध्दि का मजाक उड़ाते रहे। व्यक्ति विशेष/परिवार विशेष के प्रति व्यक्तिगत नफरती कुंठा का बदला लेने के लिए बालकों को भी ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है वह भी एक लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री के द्वारा इसकी कभी कल्पना तक नहीं की गई थी। बालकों, बालपन और बालक बुध्दि को लेकर नरेन्द्र मोदी के पहले तक भारत ही नहीं दुनिया के किसी भी प्रधानमंत्री/राष्ट्राध्यक्ष ने इतनी निम्नस्तरीय, घटिया, क्रूरतम तरीके से मजाक बनाने का एक भी उदाहरण नहीं है जैसा नरेन्द्र मोदी ने बनाया है। इससे भी ज्यादा शर्मनाक तो यह रहा कि मोदी की फूहड़ता पर सत्तापक्ष के लोग खीसें निपोरते हुए डेस्क थपथपाकर अपनी मानसिक गुलामी और मानसिक दीवालियेपन का नमूना पेश कर रहे थे।
उन्होंने एकबार भी स्पष्टतौर पर यह नहीं बताया कि उनका कहा सभी बालकों के लिए नहीं है बल्कि यह केवल प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी के लिए है। राम के नाम पर राजनीति करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तुलसीदास रचित रामचरित मानस के उन दृष्टान्तों का भी ध्यान नहीं रहा कि उसमें कितने सुन्दर और मार्मिक तरीके से भगवान राम के बालपन, बालबुध्दि का चित्रण किया गया है। इससे बेहतर तो वह बालक और उसकी बालबुध्दि थी जिसका नाम लेने से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कन्नी काटते रहे। अपने भाषण में जब उस बालक ने हिन्दुओं को लेकर जो कहा जिसे पीएम नरेन्द्र मोदी समेत पूरे भाजपाई मंत्री सांसदों ने सारे हिन्दुओं का ठेकेदार बन कर सभी हिन्दूओं का अपमान बताकर नेरेटिव गढ़ने की कोशिश की गई तो उस बालक ने तत्काल पलटवार करते हुए बताया कि उसने जो भी कहा है वह नरेन्द्र मोदी, बीजेपी और आरएसएस के लिए कहा है। नरेन्द्र मोदी भी अपनी बातों को राहुल गांधी का नाम लेकर कह सकते थे।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद के भाषण में बालक और बालकबुध्दि का जिक्र करते हुए बालकों से उनके बचपन की स्वाभाविकता और मासूमियत छीनने का काम किया है। उन्होंने बालकबुध्दि को नकारात्मक रूप में स्थापित किया है। बालकों की जिन हरकतों को मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इस तरह की हरकतें करने वाले बालक नार्मल हैं। उन्हें ऐसा करने दिया जाय समय आने पर वे खुद ही अपनी आदतों को बदल लेंगे। बच्चों की समझ तो दुनिया में सबसे निश्छल, दुनियादारी के छलप्रपंच से परे मानी जाती है लेकिन पीएम मोदी अपनी राजनीति में बालबुध्दि को छलप्रपंच के रूप में स्थापित कर रहे थे। उन्होंने बालक बुध्दि को एक ऐसी बुध्दि के रूप में स्थापित कर दिया जो सही सोचने की जगह गलत सोचता है।
परीक्षा पर चर्चा करते समय तो पीएम मोदी फेल हो जाने या कम नंबर आने को महत्वहीन मानते हैं मगर राहुल गांधी की सफलता को छोटा करने के लिए अपनी बातों से उलट जाकर बताने लगे। जिसे सठियापे का असर कहा जा सकता है। 400, 370, 303 की जगह भाजपा के 240 पर सिमट जाने, अयोध्या सहित कई महत्वपूर्ण सीटें हार जाने पर भी खुद मंथन करने के बजाय कांग्रेस को मंथन की सलाह देने से ऐसा लगा कि वे अपनी टीस पर मलहम लगा रहे हैं। जबकि राहुल ने तो 01 जुलाई को ही कह दिया था कि वे विपक्ष में बैठना स्वीकार करते हैं, खुश हैं और अपनी भूमिका निभाएंगे। इसके बावजूद भी पीएम नरेन्द्र मोदी ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा कि 24 के चुनाव में कांग्रेस के लिए भी देश की जनता ने जनादेश दिया है और वह जनादेश है आप विपक्ष में बैठिए, जब तर्क खत्म हो जायें तो चीखते चिल्लाते रहें। कांग्रेस के इतिहास का ये पहला मौका है जब लगातार तीन बार कांग्रेस 100 का आंकड़ा पार नहीं कर पाई कांग्रेस के इतिहास में ये तीसरी सबसे बड़ी हार है, तीसरा सबसे खराब प्रदर्शन है। अच्छा होता कांग्रेस अपनी हार स्वीकार करती। जनता जनार्दन के आदेश को सिर आंखों पर रखती। आत्म मंथन करती लेकिन ये तो शीर्षासन करने में लगे हुए हैं।
पीएम नरेन्द्र मोदी ये भूल गए कि भारतीय जनता पार्टी के भी कभी दो सांसद हुआ करते थे। भाजपा भी 2014 के पहले दस सालों तक विपक्ष में बैठी रही है। चुनाव में तो मोदी ये भी कहते फिर रहे थे कि कांग्रेस को राहुल की उम्र बराबर भी सीटें नहीं मिलेंगी। विपक्षी दल की मान्यता नहीं मिलेगी। मगर कांग्रेस ने राहुल की उम्र से ज्यादा सीटें (99) भी जीतीं और विपक्षी दल की मान्यता हासिल कर राहुल गांधी को नेता विपक्ष भी बनाया तो मोदी अपनी खीझ मिटाने के लिए कांग्रेस के 99 का मजाक उड़ाने लगे। मोदी ने अनुच्छेद 370 का जिक्र करते हुए कहा कि इसके लागू रहते भारत का संविधान जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता था और यहां संविधान को सिर पर रखकर नाचने वाले लोग संविधान को जम्मू-कश्मीर में लागू करने का हौसला नहीं रखते। जबकि 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि अनुच्छेद 370 संप्रभुता का लक्षण नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहीं नहीं कहा कि अनुच्छेद 370 के होने से भारतीय संविधान वहां लागू नहीं था। सवाल यह है कि अनुच्छेद 370 हट जाने से जब जम्मू-कश्मीर में सब कुछ चंगा हो गया है तो फिर कश्मीर घाटी की तीन सीटों पर भाजपा ने अपने उम्मीदवार क्यों नहीं खड़े किये ? लद्दाख में बीजेपी का कैंडीडेट हार कैसे गया ? इसका जवाब पीएम मोदी को देना चाहिए था मगर नहीं दिया।
पीएम नरेन्द्र मोदी ने इस बात का भी कोई जिक्र नहीं किया कि भारी भरकम कर्जा लेकर भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ने के लिए पलायन क्यों कर रहे हैं ? क्यों भारत के शिक्षण संस्थान विद्यार्थी जीवन के 6-7 साल बिताने लायक नहीं हैं ? क्यों पिछले दस सालों में भारत के शिक्षण संस्थानों का स्तर गिरता चला गया ? एक रिपोर्ट के मुताबिक जहां 2022 में सात लाख पचास हजार के लगभग छात्र विदेश पढ़ने गये थे वहीं 2023 में उनकी संख्या सात लाख पैसठ हजार से भी ज्यादा हो गयी । हां पीएम मोदी ने अपनी चेतावनी भरी धमकी में यह संकेत जरूर दे दिया है कि एकबार फिर से छद्म देश प्रेम के नाम पर पत्रकारों, लेखकों पर हमला किया जायेगा, बिना सबूत के लोगों को जेल में डाला जाएगा। पीएम की यह चेतावनी भरी धमकी उन यू - ट्यूबरों के लिए भी है जो गोदी मीडिया का हिस्सा नहीं बन सके हैं । पीएम के भाषण के दौरान विपक्षी सांसद मणिपुर को लेकर लगातार नारेबाजी करते रहे मगर पीएम नरेन्द्र मोदी को पहले की तरह ही इस बार भी ना तो मणिपुर का 'म' सुनाई दिया ना ही उनके मुंह से मणिपुर का 'म' निकला। इतना अहंकारी बहरापना शायद ही किसी राष्ट्राध्यक्ष/प्रधानमंत्री में होगा।
किस्से के आगे दो किस्से, किस्से के पीछे दो किस्से_ - - - - -
ओशो से उनके एक मित्र ने कहा कि मैं आपको अपनी माँ से मिलवाना चाहता हूं क्योंकि वे बहुत धार्मिक हैं। ओशो ने कहा ठीक है, मिलता हूं आपकी माँ से, क्योंकि मुझे भी धार्मिक लोगों से मिलना पसंद है। ओशो जब मित्र की माॅं से मिले तो माॅं ने पूछा कि तुम किताबें बहुत पढ़ते हो आजकल क्या पढ़ रहे हो। ओशो ने कहा आजकल मैं कुरान पढ़ रहा हूं। इतना सुनते ही मित्र की माॅं नाराज होकर कहने लगीं तुम कैसे हिन्दू हो कुरान पढ़ते हो तुम्हें अपने धर्म की किताबें पढ़नी चाहिए। बाद में ओशो ने अपने मित्र से कहा तुम तो कहते थे कि तुम्हारी माॅं धार्मिक हैं मगर वो धार्मिक नहीं साम्प्रदायिक हैं। आजकल इसी तरह के साम्प्रदायिक लोगों की भरमार है जो खुद को धार्मिक कहते फिरते हैं, खासकर राजनीति में।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार
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