सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब जिले की कमान कप्तान के हाथों में नहीं रही?
या फिर थानों की तैनाती अब पर्दे के पीछे से तय हो रही है?
लाइन में भेजने का उद्देश्य होता है—अनुशासन, जांच और सुधार। लेकिन जब 48 घंटे के भीतर ही आदेश पलट दिए जाएं, तो यह साफ संदेश जाता है कि नियम सिर्फ कागज़ों के लिए हैं, जमीन पर नहीं।
सूत्रों की मानें तो यह पूरा खेल सिफारिश और सेटिंग का है। यदि ऐसा नहीं है, तो पुलिस कप्तान को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि किस आधार पर प्रधान आरक्षक अजीत मिश्रा को इतनी जल्दी दोबारा थाने में बैठा दिया गया?
क्या किसी जांच के बिना ही उसे क्लीन चिट दे दी गई? और यदि ऐसा नहीं, तो क्या लाइन महज औपचारिक दंड बनकर रह गया है?
जिले में पहले ही पुलिस की कार्यशैली को लेकर आमजन में असंतोष है। ऐसे में इस तरह के फैसले पुलिस की साख को और कमजोर करते हैं। ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मियों के मनोबल पर भी यह सीधा प्रहार है।
अब देखना यह है कि कप्तान इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे रहते हैं, या फिर कार्रवाई कर यह साबित करते हैं कि जिले की कमान अभी भी उन्हीं के हाथ में है।
क्योंकि अगर यही हाल रहा, तो सवाल सिर्फ एक प्रधान आरक्षक का नहीं, पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का होगा।


