कटनी। शहर की वर्तमान राजनीतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि नगर में लगातार बढ़ रही अवैध कॉलोनियों को प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष संरक्षण दिया जा रहा है, जबकि वर्षों से वैध रूप से विकसित कॉलोनियां बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बदहाल स्थिति में पहुंच चुकी हैं। इस असंतुलित रवैये के कारण न केवल नगर निगम को राजस्व की भारी हानि हो रही है, बल्कि आम नागरिकों को भी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
नगर में अवैध कॉलोनियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इन कॉलोनियों से नगर निगम को न तो कर प्राप्त होता है और न ही नियोजित विकास संभव हो पाता है। इसके विपरीत, वैध कॉलोनियों में रहने वाले नागरिक नियमित रूप से कर अदा करने के बावजूद मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।
इस स्थिति का ताजा उदाहरण हाउसिंग बोर्ड की मानसरोवर कॉलोनी है जिसे पूर्व में विधिवत रूप से नगर निगम को हैंडओवर किया जा चुका है। इसके बावजूद कॉलोनी में साफ-सफाई व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। कॉलोनी में सैकड़ों की संख्या में सीवर चैंबर चोक पड़े हुए हैं, जिससे गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है।
कॉलोनी के अधिकांश हिस्सों में झाड़ी एवं झंकार की भरमार है। नियमित झाड़ू एवं कचरा संग्रहण की व्यवस्था लगभग न के बराबर है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई-कई दिनों तक सफाई कर्मचारी कॉलोनी में दिखाई नहीं देते। कभी सुव्यवस्थित और हरियाली से युक्त रहे कॉलोनी के गार्डन अब नाम मात्र के रह गए हैं। देख रेख के अभाव में ये स्थान जानवरों, कीड़े-मकोड़ों एवं असामाजिक तत्वों का अड्डा बनते जा रहे हैं। गार्डन का विकास न होने से बच्चों, बुजुर्गों एवं महिलाओं को खुले और सुरक्षित वातावरण से वंचित होना पड़ रहा है।
स्थानीय रहवासियों का आरोप है कि नगर निगम एवं प्रशासन का पूरा ध्यान केवल अवैध कॉलोनियों को वैध करने की प्रक्रिया में लगा हुआ है, जबकि पहले से वैध कॉलोनियों की समस्याओं को नजर अंदाज किया जा रहा है। इससे नागरिकों में गहरा असंतोष व्याप्त है।
अब शहरवासियों की मांग है कि प्रशासन अवैध कॉलोनियों को संरक्षण देना बंद करे, वैध कॉलोनियों में तत्काल साफ-सफाई, सीवर, उद्यान एवं अन्य बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करे तथा नगर के नियोजित विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए, ताकि कटनी शहर को स्वच्छ, सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित बनाया जा सके।
रवि कुमार गुप्ता, संपादक
( जन आवाज )



