कटनी नगर निगम का प्रस्ताव निरस्त, कोर्ट ने कहा- या तो अधिग्रहण करो या जमीन लौटाओ।
कटनी। जबलपुर। High Court of Madhya Pradesh ने कटनी के बहुचर्चित जमीन विवाद मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कहा है कि किसी व्यक्ति की निजी जमीन को बिना वैधानिक प्रक्रिया और मुआवजा दिए सार्वजनिक सड़क घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने Municipal Corporation Katni द्वारा पारित 11 जुलाई 2014 के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया है।
यह मामला कटनी के मुड़वारा क्षेत्र स्थित सर्वे नंबर 1100/6 की 0.012 हेक्टेयर जमीन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता हरि तिवारी ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2009 में नगर निगम ने उनकी जमीन का उपयोग सड़क निर्माण और स्टेडियम तक पहुंच मार्ग बनाने में किया, लेकिन इसके लिए न तो भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाई गई और न ही कोई मुआवजा दिया गया।
याचिका में बताया गया कि पहले भी वर्ष 2012 में हाईकोर्ट ने प्रशासन को भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई तेज करने और पात्र पाए जाने पर मुआवजा देने के निर्देश दिए थे। आदेश का पालन नहीं होने पर अवमानना याचिका दायर की गई, जिसके बाद कलेक्टर कटनी ने नगर निगम को मुआवजा भुगतान के निर्देश दिए।
मामले की जांच के दौरान नगर निगम के इंजीनियरों ने अपनी रिपोर्ट में माना कि संबंधित जमीन स्टेडियम तक पहुंच मार्ग के रूप में उपयोग में है और पूरी जमीन अधिग्रहित किए जाने की आवश्यकता है। रिपोर्ट में वर्ष 2013-14 की कलेक्टर गाइडलाइन के आधार पर जमीन की कीमत लगभग 1.95 करोड़ रुपये आंकी गई थी।
इसके बावजूद मेयर-इन-काउंसिल ने 11 जुलाई 2014 को प्रस्ताव पारित कर कहा कि जमीन पहले से रास्ते के रूप में उपयोग हो रही है, इसलिए अधिग्रहण और मुआवजा आवश्यक नहीं है। इसी प्रस्ताव को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से कहा गया कि जमीन को सार्वजनिक सड़क घोषित नहीं किया गया था, बल्कि मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान अस्थायी रूप से पहुंच मार्ग बनाया गया था। साथ ही यह भी दलील दी गई कि भूमि अधिग्रहण की कोई औपचारिक मांग नहीं भेजी गई थी।
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब जमीन का स्वामित्व याचिकाकर्ता का सिद्ध हो चुका है तो बिना वैधानिक अधिग्रहण के उसका उपयोग नहीं किया जा सकता। अदालत ने नगर निगम का प्रस्ताव निरस्त करते हुए निर्देश दिए कि यदि सड़क के लिए जमीन की आवश्यकता है तो विधि अनुसार अधिग्रहण कर बाजार मूल्य के अनुसार मुआवजा दिया जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि जमीन की आवश्यकता नहीं है तो सीमांकन कर उसका कब्जा वापस याचिकाकर्ता को सौंपा जाए। पूरी प्रक्रिया तीन माह के भीतर पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता भी दी है कि वह जमीन के उपयोग के बदले अलग से क्षतिपूर्ति और नुकसान भरपाई के लिए सिविल कोर्ट में दावा प्रस्तुत कर सकता है।


