जिस तरह से कटनी के पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा तमाम कार्रवाई को ऑपरेशन शिकंजा नाम दिए हुए हैं, लेकिन हर क्षेत्र में अवैध कारोबार बदस्तूर जारी है, उसे देख कर ऐसा ही लग रहा है मानो ऑपरेशन शिकंजा नहीं बल्कि ऑपरेशन संरक्षण चल रहा हो? बात यदि खनिज ( रेत ) की करें तो क्षेत्र में रात के अंधेरे से लेकर दिन के उजाले तक रेत का परिवहन जारी है। सवाल यह है कि जब अवैध खनन और परिवहन इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है तो भारी वाहन पुलिस के ऑपरेशन शिकंजा और प्रशासन की नजरों से कैसे बच रहे हैं? इसको लेकर प्रशासनिक कार्रवाई की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस कभी-कभार ट्रैक्टर-ट्रॉली पकड़कर कार्रवाई का ढोल पीटती है, जबकि बड़ी मात्रा में रेत का परिवहन करने वाले हाईवा और डंपर बेखौफ सड़कों पर दौड़ते रहते हैं। ऐसे में छोटी कार्रवाई को उपलब्धि बताकर वाहवाही लूटने की कोशिश की जा रही है, जबकि अवैध कारोबार की जड़ तक पहुंचने के प्रयास नजर नहीं आते।
क्षेत्र में चर्चा है कि अवैध खनन के पीछे संगठित नेटवर्क काम कर रहा है। नदी घाटों पर मशीनों से उत्खनन और रात के अंधेरे में भारी वाहनों की आवाजाही आम बात हो गई है। इसके बावजूद बड़ी मछलियां कार्रवाई से बच जाती हैं और छोटे वाहन चालक ही प्रशासनिक शिकंजे में आते हैं।
सवाल यह भी उठ रहा है कि जब लगातार अवैध रेत परिवहन की शिकायतें सामने आ रही हैं तो खनिज विभाग, राजस्व अमला और पुलिस की संयुक्त एवं प्रभावी कार्रवाई क्यों दिखाई नहीं देती। यदि वास्तव में अवैध खनन रोकना है तो केवल ट्रैक्टर-ट्रॉली जब्त करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरे नेटवर्क पर प्रहार करना होगा।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि जब तक अवैध उत्खनन स्थलों, भंडारण केंद्रों और बड़े परिवहनकर्ताओं पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक रेत माफिया पर अंकुश लगाना मुश्किल है। बड़वारा और विजयराघवगढ़ में बढ़ते अवैध खनन ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सवाल यह भी है कि क्या अवैध रेत कारोबार पर वास्तव में लगाम लग रही है या फिर केवल दिखावटी कार्रवाई कर आंकड़ों का खेल खेला जा रहा है? "फिलहाल अभी के लिए इतना ही शेष अगले अंक में"।
![]() |
| रवि कुमार गुप्ता, संपादक ( जन आवाज ) |



