कटनी। सिटीजन्स फार डेमोक्रेसी (सीएफडी) आपके उस बयान का कड़ा विरोध करता है जिसमें आपने पर्यावरण विदों आर टी आई कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों की तुलना काॅकरोच और परजीवियों से की है। एक वकील द्वारा "वरिष्ठ अधिवक्ता" (Senior Advocate) का दर्जा दिए जाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए, आपने 15 मई 2026 को अदालत में कहा था, 'समाज में पहले से ही ऐसे परिजीवी मौजूद है जो व्यवस्था पर हमला करते हैं और आप उनके साथ हाथ मिलाना चाहते हैं?... कुछ युवा काॅकरोच की तरह होते हैं जिन्हें न तो कोई रोजगार मिलता है और न ही पेशे में कोई जगह। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया, आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर वे हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं "। आपके इस बयान से कार्यकर्ताओं में भारी रोष और गुस्सा फैल गया, जिसके बाद अगले ही दिन आपने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की " मुझे यह पढ़ कर बहुत दुख हुआ कि मीडिया के एक वर्ग ने कल एक 'तुच्छ' मामले की सुनवाई के दौरान मेरे द्वारा मौखिक रूप से की गई टिप्पणियों को किस तरह तोड़ मरोड़ कर पेश किया है। मैंने विशेष रूप से उन लोगों की आलोचना की थी जिन्होंने फर्जी और जाली डिग्रियों के सहारे वकालत के पेशे जैसे क्षेत्रों में प्रवेश पा लिया है। ऐसे ही लोग मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य प्रतिष्ठित पेशों में भी घुसपैठ कर चुके हैं और इसीलिए वे परजीवियों के समान हैं। यह कहना पूरी तरह से बेबुनियाद है कि मैंने हमारे देश के युवाओं की आलोचना की है। मुझे न केवल हमारे वर्तमान और भविष्य के मानव संसाधन पर गर्व है बल्कि भारत का हर युवा मुझे प्रेरित करता है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत के युवा मेरे प्रति बहुत आदर और सम्मान रखते हैं और मैं भी उन्हें एक विकसित भारत के स्तंभों के रूप में देखता हूं। यह एक बेहद कमजोर सफाई है क्योंकि आपका बयान सीधे तौर पर उन कार्यकर्ताओं को ही निशाना बनाता है जिनके बारे में आपने यह मान लिया है कि यदि वे युवा है और कार्यकर्ता बन गये हैं तो इसका मतलब है कि वे कोई रोजगार पाने में असफल रहे होंगे। संक्षेप में कहें तो : वरिष्ठ वकील का दर्जा मांगने वाले एक वकील के मामले का संदर्भ लेते हुए आपने उन सभी लोगों पर लांछन लगाने की कोशिश की है जो देश के आम नागरिकों के हक में आवाज उठाते हैं। हमें हैरानी होती है कि आप एक न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे हुए स्वयं ऐसी किसी सफाई को स्वीकार करते ? आपके लिए यही उचित होता कि आप अपनी उन कटु और अनुचित टिप्पणियों को वापस ले लेते और अपनी अनजाने में हुई इस चूक के लिए माफी मांग लेते। आखिर आपकी इस टिप्पणी के पीछे क्या न्यायिक तर्क (Judicial rationale) था । इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि आपकी यह टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस बयान के बिल्कुल करीब है जिसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं को 'आन्दोलन जीवी' बताया था। उन्होंने कई नाम दिए हैं - अर्बन नक्सल, लुटियंस, दिल्ली गैंग, खान मार्केट गैंग और इसके अलावा बेझिझक राष्ट्रविरोधी भी कहा है लेकिन 'आंदोलन जीवी' नाम सबसे अलग है। इससे आलोचना के प्रति उनकी नापसंदगी जाहिर होती है लेकिन जब उन्होंने वह शब्द गढ़ा तो हमने उसकी परवाह नहीं की थी क्योंकि हम उन्हें एक दलीय राजनेता के तौर पर जानते हैं जिनका अपना स्वार्थ होता है और जो उन व्यक्तियों के ऐजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं जिन्होने उन्हें इस पद तक पहुंचाया है। हम अच्छी तरह समझते हैं कि वे हम जैसे कार्यकर्ताओं को क्यों नापसंद करते हैं। लेकिन कार्यकर्ताओं के प्रति आपकी नापसंदगी बेहद परेशान करने वाली है। सभी कार्यकर्ताओं और सच कहूं तो सभी नागरिकों का अब तक न्यायपालिका पर विशेष रूप से उच्च न्यायपालिका पर पूरा भरोसा रहा है लेकिन आपकी पक्षपात पूर्ण और बिना मांगी टिप्पणी में न्यायपालिका में हमारे भरोसे को जरा झटका लगा है। हमें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या किसी जज के निजी पूर्वाग्रह उनकी ऊंची ऊंची बातों में कोई भूमिका निभाते हैं जिन्हें वे लंबे और विद्वत्ता पूर्ण फैसलों के रूप में पेश करते हैं। आपकी याद ताजा करने के लिए बता रहे हैं कि 20 अगस्त 2024 को In Re : Right to privacy of Adolescent (किशोरों के निजता के अधिकार के संबंध में) नाम स्वत: संज्ञान मामले जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्जवल भुइयां की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया था और उसकी टिप्पणियों पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। कोर्ट ने कहा था 'कोर्ट के किसी भी फैसले में जज के अलग अलग विषयों पर निजी विचार शामिल नहीं हो सकते। इसी तरह कोर्ट पार्टियों को सलाह देकर या आम तौर पर सलाह देकर अपनी सलाहकार क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता। जज को किसी भी मामले पर फैसला देना होता है न कि उपदेश देना होता है। ये सभी जजों के लिए सुनहरे शब्द हैं हालांकि पूर्वाग्रह न्यायिक अतिरेक (Judicial over read) में भी झलक सकता है। आइए, उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अर्जी का ही उदाहरण लें जिसे उस बेंच ने खारिज कर दिया था जिसमें आप भी शामिल थे। न केवल उसकी जमानत अर्जी खारिज की गई बल्कि आपने उन्हें एक साल तक दोबारा जमानत अर्जी लेकर आने से भी रोक दिया। आपके निजी पूर्वाग्रह के अलावा हमें आपके इस फैसले के पीछे कोई तर्क नजर नहीं आता कि आप एक साल तक उमर और शरजील जैसे तिलचट्टे (cockroaches) को नहीं देखना चाहते। आपके गुस्से का निशाना आम तौर पर बेरोजगार युवा नहीं है बल्कि वे कार्यकर्ता थे जो "हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं"। फिर भी सक्रियता (activism) न्यायपालिका के लिए कोई नई चीज़ नहीं है भारत में खुद न्यायपालिका की भी न्यायिक सक्रियता की एक परंपरा रही है। कानूनी विद्वान उपेन्द्र बख्शी ने कहा था 'विभिन्न सामाजिक समूह उर्जा का मूल्यांकन उनके हितों में विचारधाराओं और मूल्यों के आधार पर एक्टिविस्ट के तौर पर करते हैं' - लेकिन उन्हें इसकी कोई तय परिभाषा नहीं मिली और आखिर में उन्होंने यह परिभाषा अपनाई 'एक एक्टिविस्ट जज वह व्यक्ति होता है जिसने उस सत्ताधारी वर्ग की उम्मीदों को तोड़ा हो, जिसने उसे जज की कुर्सी पर बिठाया था'। लेकिन फिर सत्ता समर्थक न्यायिक सक्रियता भी हो सकती है। हमें नहीं पता कि न्यायपालिका अभी उस दौर से गुजर रही है या नहीं लेकिन हमें एक मामला याद आता है : 25 सितम्बर 2024 को मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस बी श्रीशनंदन की कुछ विवादित टिप्पणियों के वायरल क्लिप में जुड़े एक मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई की। सुनवाई के दौरान एक वीडियो में उन्हें बेंगलूरु के एक इलाके का जिक्र करते हुए देखा गया, जो जाहिर तौर पर मुस्लिम बहुल है और उसे उन्होंने 'पाकिस्तान' कहा। एक दूसरे वीडियो में उन्हें वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में एक महिला वकील के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हुए देखा गया। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद जज द्वारा खुली अदालत में खेद व्यक्त किए जाने के मद्देनजर शीर्ष अदालत ने इस मामले को आगे ना बढ़ाने का फैसला किया। पांच जजोंं की पीठ ने अपने आदेश में कहा "इसलिए अदालत को न्यायिक कार्रवाई के दौरान ऐसी टिप्पणियां करने से सावधान रहना चाहिए जिन्हें महिला विरोधी या हमारे समाज के किसी भी वर्ग के प्रति पक्षपात पूर्ण माना जा सकता है" । माई लाॅर्ड, हम तिलचट्टे 65 मिलियन साल पहले जुरासिक युग में अस्तित्व में आये थे। जब डायनासोर धरती पर घूमते थे। एक आसमानी आफत ने हमारे विशालकाय दोस्तों को इस ग्रह से मिटा दिया लेकिन हम बच गए और हम बचे रहेंगे। तानाशाहों के बूट किसी एक तिलचट्टे को तो कुचल सकते हैं लेकिन हमारी प्रजाति बची रहेगी। हम कल भी थे और आज भी हैं। जब तक जनविरोधी नीतियां रहेंगी तब तक हमारा अस्तित्व भी बना रहेगा। हम असमानता और अन्याय से भरे इस तंत्र के ही एक उप-उत्पाद हैं। दुर्भाग्य से आप दीमकों को नहीं देख पाए। वे आपकी किताबों, फर्नीचर, अलमारियों और आपके घर के दरवाजे तक चट कर जाते हैं। वे उन सरकारी फाइलों को भी खा जाते हैं जिन्हें आप जांच पड़ताल के लिए मंगवाते हैं। इतना ही नहीं वे पूरे के पूरे जंगल ही खा जाते हैं। हमारे जंगलों का बेरहमी से दोहन इन्हीं दीमकों द्वारा किया जाता है जो आम लोगों की कीमत पर फलते फूलते हैं। ये आम लोग हैं "गरीब आदिवासी" जिन्हें जबरदस्ती उनकी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है, ताकि उन बड़े-बड़े पूंजीपतियों के लिए जगह बनाई जा सके जो चुनाव और सरकारें भी चलाते हैं। हमारा अस्तित्व ही इसलिए है ताकि हम इन दीमकों को यह बता सकें कि वे और कुछ नहीं बस दीमक ही हैं। ऐसे दीमक जो किसानों और मजदूरों द्वारा बनाए गए इस देश को ही भीतर से खोखला कर रहे हैं। माई लाॅर्ड, आप सहमत हों या ना हों, हम तो यही मानते हैं कि समाज के वंचित तबकों के हितों की रक्षा करना ही न्यायपालिका का सबसे पहला और सबसे अहम कर्तव्य है। यह कोई पुण्य कमाने वाला काम नहीं है बल्कि हमारे संविधान में ही लिखा हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ता और विकास की भेंट चढ़े पीड़ित लोग आज भी आपके पास आते हैं और आते रहेंगे और इसीलिए हमारी मौजूदगी से नाराज होने का आपके पास कोई कारण नहीं है। हम वंचितों के हितों की रक्षा करने का अपना कर्तव्य निभा रहे हैं और हम इसे आगे भी निभाते रहेंगे। अब यह फैसला आपको ही करना है कि आप संविधान के साथ खड़े होकर इन तिलचट्टों का साथ देंगे या फिर दीमकों के हितों की रक्षा करेंगे।
यह पत्र सिटीजन्स फाॅर डेमोक्रेसी के अध्यक्ष आनंद कुमार और महासचिव शशि शेखर प्रसाद सिंह ने सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत को लिखा है। यह पत्र न्यायपालिका को आईना दिखाता है। यह पत्र न्यायपालिका के सच के साथ पूरे सिस्टम के सच को भी उजागर करता है। जो किसी एक व्यक्ति के अहम को पूरा करने के लिए काम्प्रोमाइज्ड हो चुका है। जबकि संविधान की रोशनी को बनाए और बचाए रखने की जिम्मेदारी न्यायपालिका के कंधे पर है लेकिन दुर्भाग्य से न्यायपालिका के भीतर कुछ ऐसे जजेज भी हैं जो संविधान की रोशनी को बुझाने की साजिश करने वाले तत्वों के साथ कदमताल करते दिख रहे हैं। सिटीजन्स फाॅर डेमोक्रेसी (सीएफडी) का गठन 13-14 अप्रैल 1974 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा किया गया था। जिसने वैचारिक अगुवाई करते हुए सम्पूर्ण क्रांति के जरिए श्रीमती इंदिरा गांधी की सत्ता पलट दी थी। इस संस्था को जस्टिस छागला, जस्टिस तारकुंडे, प्रोफेसर वी जाॅन, एस आर हरमेत, एन रमेश, एल वी सुब्रमण्यम, कुलदीप नैयर जैसे नामचीन लोगों ने आगे बढ़ाया है। आज भी इस संस्था में देश के ख्यातिलब्ध मेम्बरान हैं।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार


