कटनी। जिले में लगातार सामने आ रही आपराधिक घटनाओं, विवादों और जनसुनवाई में पहुंच रहे शिकायतकर्ताओं की बढ़ती संख्या ने एक बार फिर कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक चोरी, मारपीट, अवैध कारोबार, महिला उत्पीड़न और जमीन संबंधी विवादों के मामलों को लेकर आम लोगों में चर्चा है कि आखिर कानून का डर खत्म क्यों होता जा रहा है।
कई नागरिकों का कहना है कि पहले अपराधी पुलिस और कानून के नाम से डरते थे, लेकिन अब हालात ऐसे दिखाई देते हैं मानो कानून का भय धीरे-धीरे कम होता जा रहा हो। यही वजह है कि सोशल मीडिया और चौपालों में लोग तंज कसते हुए कह रहे हैं— "कटनी में कभी कानून नाम की चिड़िया हुआ करती थी, पता नहीं किस डाल से उड़कर फुर्र हो गई!"
हाल के दिनों में कुछ चर्चित मामलों ने भी प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर बहस छेड़ दी है। पीड़ित पक्षों द्वारा न्याय में देरी, कार्रवाई में भेदभाव और प्रभावशाली लोगों को संरक्षण मिलने जैसे आरोप लगाए जाते रहे हैं। हालांकि पुलिस और प्रशासन इन आरोपों को खारिज करते हुए लगातार कार्रवाई करने और अपराधियों पर अंकुश लगाने का दावा करते हैं।
जानकारों का मानना है कि केवल अपराध दर्ज करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई से जनता के बीच कानून पर भरोसा कायम रखना भी उतना ही जरूरी है। जब पीड़ित को समय पर न्याय नहीं मिलता, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है।
फिलहाल कटनी में कानून-व्यवस्था को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कानून की वह "चिड़िया" सचमुच उड़ गई है, या फिर उसे वापस जनता के भरोसे की शाख पर बैठाने के लिए और अधिक सख्त तथा पारदर्शी कार्रवाई की जरूरत है?
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| रवि कुमार गुप्ता, संपादक ( जन आवाज ) |



