कटनी। यदि आप चेक बाउंस (धारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम) के किसी मामले में पक्षकार हैं और समझौते की संभावना है, तो उसे समय रहते पूरा करना आपके लिए आर्थिक रूप से लाभदायक हो सकता है। जैसे-जैसे मामला उच्च अदालतों तक पहुंचता है, समझौते की लागत भी बढ़ती जाती है।
कानूनी प्रावधानों और न्यायालयों द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि मामला सेशंस कोर्ट या हाई कोर्ट तक पहुंचने के बाद समझौते से समाप्त होता है, तो संबंधित पक्ष को चेक राशि का 7.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त लागत जमा करनी पड़ सकती है। वहीं, यदि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाता है और वहां समझौता होता है, तो यह अतिरिक्त लागत 10 प्रतिशत तक हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चेक बाउंस मामलों में समय रहते आपसी समझौता करने से न केवल लंबी कानूनी प्रक्रिया से राहत मिलती है, बल्कि अतिरिक्त आर्थिक बोझ से भी बचा जा सकता है। मुकदमा जितना लंबा चलेगा, उतना अधिक समय, धन और कानूनी खर्च उठाना पड़ सकता है।
ऐसे में यदि दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार हैं, तो प्रारंभिक चरण में ही विवाद का समाधान करना अधिक व्यावहारिक और किफायती माना जाता है। इससे अदालतों पर लंबित मामलों का बोझ भी कम होता है और दोनों पक्षों का समय व संसाधन बचते हैं।


