खरी-अखरी(सवाल उठाते हैं पालकी नहीं)
कटनी। पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा समय से बीजेपी और उसके नेताओं की कतार, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह भी शामिल हैं, करोड़ों रुपये फूंक कर जिसको जर्सी बछड़ा और पप्पू कह कर बेइज्जत करने से चूक नहीं रहे थे क्या वाकई वह जर्सी बछड़ा अब सांड़ बनकर बीजेपी और उसके नेताओं को डराने लगा है और पप्पू अब बीजेपी के लिए पापा बनकर उसके कान उमेड़ने लग गया है ! बीते एक महीने की घटनायें तो यही बता रही हैं। मामला दिल्ली पुलिस की अधिकारिक क्षेत्राधिकारिता का है। यानी केन्द्रीय गृह मंत्रालय मतलब अमित शाह का है लेकिन वे तो संसद में एक तरह से भगोड़ा साबित हो चुके हैं ! तो क्या इसीलिए जब लीडर आफ अपोजीशन राहुल गांधी, 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर चलाई गई पैलट गन से अपनी आंखों की रोशनी तकरीबन तकरीबन गवां चुके, 17 वर्षीय साहिल लोचप (जिसे कुछ लोग मुस्लिम समझ कर ट्रोल कर रहे हैं) और उसके परिजनों को लेकर संसद मार्ग पुलिस स्टेशन नई दिल्ली पहुंच कर एफआईआर दर्ज करने की मांग की तो पुलिस ने एफआईआर लिखने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि ऊपर के हुक्मरानों ने एफआईआर नहीं लिखने का अघोषित हुक्मनामा जारी किया हुआ है। तब एलओपी को यह साफ साफ कहना पड़ा कि एफआईआर तो लिखी जाएगी भले ही उसके लिए उन्हें 6 महीने तक थाने के गेट पर बैठना पड़े। 6 महीने तो नहीं लेकिन एलओपी को थाने के गेट पर साढ़े सात घंटे तक धरना प्रदर्शन करना पड़ गया। तो क्या यह एलओपी का साढ़े सात घंटे का धरना-प्रदर्शन मोदी सरकार के लिए साढ़े साती साबित होगा ?
आखिरकार दिल्ली पुलिस को अज्ञात के नाम पर एफआईआर दर्ज करनी पड़ी। एफआईआर में मुख्य रूप से बीएनएसएस की धारा 118 और 125 का उल्लेख किया गया है। खतरनाक हथियारों का इस्तेमाल करके चोट या गंभीर चोट पहुंचाने से संबंधित है धारा 118। धारा 125 में जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालने वाला कार्य आता है। सवाल यह है कि जो काम बिना एलओपी के आए चंद मिनट में हो सकता था उसे एलओपी के बावजूद करने के लिए साढ़े सात घंटे क्यों लगे ? वह भी खुले तौर पर यह कहने के बाद कि जब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी हम जाने वाले नहीं हैं। कहा जाता है कि किसी समझदार व्यक्ति ने फोन करके पुलिस के मुखिया और सरकार के मुखिया नंबर दो को समझाया कि एफआईआर दर्ज करवाना नागरिक का अधिकार है और एफआईआर दर्ज करना पुलिस की जिम्मेदारी और जबावदेही है। यानी इस टेलीफ़ोन ने ऊपर से नीचे तक बैठे हर किसी के दिमाग की बत्ती जला दी। सवाल तो जायज है - टेलीफ़ोन किसने किसको किया ? इस दौर में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर, गृह सचिव यहां तक कि गृहमंत्री, नौकरशाही की पूरी टीम, डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर के भीतर बैठे हुए उच्च पुलिस कर्मियों के होश फाख्ता हैं। उन्हें सूझ ही नहीं रहा था कि करें तो करें क्या ?
देश के भीतर सवाल तो हैं कि इस सरकार की लगाम किसके हाथ में है ? यह सरकार किसके इशारों पर चल रही है ? इस सरकार को दिशा निर्देश कौन देता है ? क्या सरकार इतना बिखर चुकी है कि किसी को पता ही नहीं है अगले पल निर्णय कौन लेगा और उस निर्णय से सरकार कहीं खतरे में तो नहीं आ जाएगी ? नौकरशाही और पुलिसिया रुख अलग अलग है। जांच ऐजेंसियों की खामोशी है। जांच करने वाले अधिकारी सकपकाए हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के भीतर भी एक अजीबोगरीब चुप्पी है। और इन सबके बीच दिल्ली के भीतर जब संसद मार्ग थाने पर उमस भरी गर्मी में विपक्ष का नेता साढ़े सात घंटे धरना देता है और सरकार घुटनाटेक हो जाती है। अगर सरकार घुटनाटेक नहीं होती तो क्या फिर आर-पार की लड़ाई शुरू हो जाती ? क्या देश को एक ऐसी तस्वीर देखने को मिल जाती जिसमें दिखाई देता कि गवर्नेंस भीतर से खोखली हो गई है। अगर पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती तो क्या एलओपी कुर्सी से उतर कर जमीन पर बिछी हुई चादर पर बैठ जाते ? और यहीं से शुरू हो जाती अगली कहानी - यही वो मिट्टी है जहां पर हमारा खून सना हुआ है। यही वो मिट्टी है जिसकी आजादी की लड़ाई हमने लड़ी और वंदेमातरम गीत बना। यही वो मिट्टी है जिस पर बैठ कर अब एफआईआर दर्ज कराने की स्थिति आजाद भारत में आ गई है।
ये सारे सवाल मुंह बाये सरकार की तरफ देख रहे थे और सरकार घबरा रही थी। नौकरशाहों से लेकर पीएमओ तक खलबली मची हुई थी। मंथन के बाद तय किया गया कि एफआईआर लिखी जाएगी लेकिन आरोपी के नाम वाली जगह पर अज्ञात लिखा जाएगा। लेकिन एक बात तो तय है कि किसी पुलिस वाले ने ही पैलेट चलाया है। यह भी तय है कि पैलेट चलाने वाले पुलिस कर्मी ने पैलेट चलाने का निर्णय खुद नहीं लिया है। यह भी तय है कि पैलेट चलाने का आदेश ऊपर से आया है। उस ऊपर वाले को देश जानता है। ऐसा लग रहा है कि जहां से पैलेट चलाने का आदेश आया है वहां पर भी एक मत नहीं था। यानी नौकरशाही का रुख अलग था और मंत्री का रुख अलग था। अब सहमति असहमति के बीच बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि गृहमंत्री अमित शाह की कुर्सी बचेगी या नहीं बचेगी.! क्योंकि इस दौर में वह भी पीएमओ की तरफ टकटकी लगाए देख रहे हैं और नौकरशाही जिस परसेप्शन और नैरेटिव को डवलप करती है उसकी भी धड़कनें बढ़ी हुई हैं।
मौजूदा परिस्थितियों से पूरी सरकार, पूरी बीजेपी, संरक्षणदाता सुप्रीम कोर्ट, मीडिया, नौकरशाही, सुरक्षा कर्मी सभी हैरत में हैं। कल तक एक निर्णय आता था और फैसला हो जाता था और आज कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है - आखिर क्यों? एलओपी ने बकायदा पत्रकारों को सबूत के तौर पर पैलेट दिखाए जो साहिल लोचप के शरीर से इलाज के दौरान डाक्टर ने निकाले थे। बकायदा डाक्टरी रिपोर्ट बताई गई कि उसमें क्या लिखा हुआ है। तो क्या सरकार लड़खड़ाने लगी है ? सरकार में कोई निर्णय ले पाने की स्थिति में नहीं है या फिर जो पिरामिड गवर्नेंस को लेकर बनाया गया उसके शीर्ष पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं और उसके ठीक नीचे गृहमंत्री अमित शाह हैं और उसके बाद एक लंबा रिक्त स्थान (वैक्यूम) है और उस वैक्यूम के भीतर कोई भी मिनिस्टर फिर चाहे वो राजनाथ सिंह हो या जेपी नड्डा या फिर कोई और कोई भी कोई मायने नहीं रखता है।
पीएमओ उस सोशल मीडिया से लड़ाई लड़ रहा है जिस मीडिया के भीतर जं जी ने उसके मुखौटे को पूरी तरह से नोच कर फेंक दिया है और देश के बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर उठने वाले सवालों के साथ सामने आकर खड़ा हो गया है। तो क्या अब वह इस बात पर खामोशी बरत कर चिंतन-मनन करने लगा है कि अब शोसल मिडिया से कैसे लड़ा जाए। लेकिन मौजूदा राजनीतिक सत्ता अपने अहंकार, अपने गुरूर में इतनी मशगूल है कि उसे लगता है कि वह जो कर रही है सब ठीक ठाक कर रही है। तभी तो उसके चापलूसों की भीड़ जयपुर (राजस्थान) से लगभग 40 किलोमीटर दूर रामपुरा कवंरपुरा गाँव के स्कूल की जर्रजर इमारत में कोई सुधार कार्य ना हो पाए इसके लिए गुंडागर्दी करने पहुंच जाती है । यहां पर भी दिल्ली वाला सवाल आकर खड़ा हो गया है - निर्णय कौन लेगा ? राजस्थान के मुख्यमंत्री या जयपुर के कमिश्नर।
अगर निर्णय के तार देश की राजनीतिक सत्ता को डिगा चुके हैं या निर्णय ना ले पाने की परिस्थितियों में जो अभी तक माना जा रहा था कि नैरेटिव परसेप्शन पीएमओ बनाएगा और नकेल होम मिनिस्ट्री कसेगी तो इस समय तो होम मिनिस्ट्री खुद कटघरे में खड़ी है क्योंकि संसद मार्ग थाने में घुटने के बल खड़े होकर जो एफआईआर दर्ज की गई है उसमें लिखे गए अज्ञात का मतलब पुलिस कर्मी है। पुलिस को निर्देश देने वाला है। क्या यह ढहती हुई व्यवस्था का प्रतीक है ? क्या यह टकराव है या ठहरा हुआ सिस्टम ? इसमें चेहरा कौन है, मुखौटा कौन है, लगाम किसके हाथ में है इस दौर में सब बिखरा हुआ सा है। लेकिन यह रुकने वाला भी नहीं है। शायद इसीलिए उल्टी गिनती में पहला नंबर होम मिनिस्टर अमित शाह का आयेगा या उसे बाईपास करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ही आ जाएगा। और इस सवाल की सबसे ज्यादा गूंज बीजेपी, संघ परिवार और कार्पोरेट के भीतर गूंज रही है।
कहने को तो सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी है कि 2000 से ज्यादा असामाजिक तत्वों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है लेकिन उसमें एक अदद एफआईआर ऐसी नहीं है जिसमें इस बात का एक शब्द भी उल्लेख हो कि जंतर-मंतर पर पुलिस ने जं जी के साथ अमानवीय व्यवहार किया। जं जी पर कील वाली लाठियां चलाई गई, पैलेट गन चलाई गई, पुरुष पुलिस कर्मियों द्वारा बालिकाओं के प्राइवेट पार्ट में डंडा डालने की हरकत की गई, पुरुष पुलिस कर्मियों द्वारा बच्चियों के दूसरे निजी अंगों पर प्रहार किया गया। कहने को तो सुप्रीम कोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यों की हाई पावर कमेटी बना दी है। लेकिन क्या उसकी जांच रिपोर्ट भी वैसी ही होगी और उसका परिणाम भी वैसा ही होगा जैसा अंबानी के लड़के द्वारा चलाए जा रहे जानवरों के आशियाने पर लगे आरोपों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जांच कमेटी बनाई थी और उसकी दी गई जांच रिपोर्ट का हुआ था। दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर बड़े भाजपाई चेहरे रविशंकर प्रसाद और जेपी नड्डा पर कालिख पोत दी है!
अश्वनी बडगैयाअधिवक्ता
(स्वतंत्र पत्रकार)


