हाईकोर्ट अधिवक्ता ने राज्यपाल से लेकर पुलिस मुख्यालय तक भेजी शिकायत, गृह विभाग की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल; ई-फाइल कई महीनों से लंबित रखने का आरोप
कटनी/भोपाल। कटनी के पूर्व पुलिस अधीक्षक और वर्ष 2014 बैच के IPS अधिकारी अभिजीत कुमार रंजन के खिलाफ प्रस्तावित विभागीय जांच को लेकर मध्यप्रदेश में प्रशासनिक स्तर पर एक गंभीर सवाल खड़ा हुआ है। जबलपुर के अधिवक्ता देवेंद्र शर्मा ने 21 अगस्त 2026 को राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक और पुलिस मुख्यालय सहित वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत भेजकर आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री की प्रशासनिक स्वीकृति और पुलिस मुख्यालय की अनुशंसा के बावजूद अभिजीत कुमार रंजन से संबंधित विभागीय जांच की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही है।
शिकायत का मुख्य सवाल यह है कि यदि विभागीय जांच के लिए शासन स्तर पर प्रशासनिक अनुमोदन दिया जा चुका है और पुलिस मुख्यालय भी जांच की अनुशंसा कर चुका है, तो संबंधित ई-फाइल अब तक लंबित क्यों है?
शिकायत-पत्र में गृह विभाग के स्तर पर फाइल को कई महीनों से लंबित रखे जाने और अधिकारी द्वारा अपने पद एवं प्रभाव का इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगाए गए हैं।
शिकायत में क्या कहा गया है?
21 अगस्त 2026 को दिए गए आवेदन में शिकायतकर्ता ने उल्लेख किया है कि मध्यप्रदेश कैडर के वर्ष 2014 बैच के IPS अधिकारी अभिजीत कुमार रंजन के खिलाफ होने वाली विभागीय जांच को मुख्यमंत्री की ओर से प्रशासनिक अनुमोदन दिया जा चुका है।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि इसके बाद गृह विभाग के स्तर से विभागीय जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की कार्रवाई अपेक्षित थी। वहीं पुलिस मुख्यालय भोपाल की ओर से भी विभागीय जांच की अनुशंसा गृह विभाग को भेजे जाने का दावा किया गया है।
सबसे बड़ा सवाल—CM की मंजूरी के बाद फाइल क्यों नहीं बढ़ी?
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि विभागीय जांच से संबंधित ई-फाइल को कई महीनों से लंबित रखा गया है। आवेदन में दावा किया गया है कि यह देरी अधिकारी के पद एवं प्रभाव के कारण हो रही है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से विभागीय जांच के संबंध में कई बार पत्राचार किए जाने के बावजूद गृह विभाग की ओर से जांच शुरू नहीं की गई।
यही बिंदु इस पूरे मामले को गंभीर बनाता है। क्योंकि शिकायतकर्ता का तर्क है कि जब शासन स्तर पर जांच की प्रशासनिक स्वीकृति और PHQ की अनुशंसा मौजूद है, तो उसके बाद फाइल की वास्तविक प्रगति क्या है और किस स्तर पर वह लंबित है, इसका स्पष्ट होना जरूरी है।
ACR में चार अंक का दावा भी शिकायत का हिस्सा
शिकायत-पत्र में IPS अधिकारी अभिजीत कुमार रंजन की गोपनीय चरित्रावली यानी ACR को लेकर भी दावा किया गया है।
आवेदन में कहा गया है कि राज्य शासन द्वारा उनकी ACR में केवल 4 अंक दिए गए हैं। शिकायतकर्ता ने इसे अधिकारी के सेवा रिकॉर्ड से जोड़ते हुए पूर्व DGP विवेक जौहरी की कथित टिप्पणी का भी हवाला दिया है।
शिकायत के अनुसार, पूर्व DGP ने ACR में कथित रूप से यह टिप्पणी की थी कि अभिजीत कुमार रंजन फील्ड पोस्टिंग के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
लोकायुक्त शिकायत का भी उल्लेख
आवेदन में यह भी दावा किया गया है कि अभिजीत कुमार रंजन के खिलाफ मध्यप्रदेश लोकायुक्त में शिकायत की गई है और लोकायुक्त द्वारा शिकायत पर जांच शुरू की गई है।
संजीव कंचन के मामले से तुलना
शिकायतकर्ता ने अपने आवेदन में प्रमोटी IPS अधिकारी संजीव कुमार कंचन के खिलाफ चल रही विभागीय जांच का भी उल्लेख किया है।
आवेदन के मुताबिक, संजीव कंचन के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जा चुकी है। इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि जब एक अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जा सकती है, तो अभिजीत कुमार रंजन के मामले में मुख्यमंत्री की प्रशासनिक स्वीकृति और PHQ की अनुशंसा के बावजूद फाइल आगे क्यों नहीं बढ़ रही है।
शिकायत में किन अधिकारियों को भेजा गया आवेदन?
21 अगस्त 2026 के आवेदन में शिकायतकर्ता ने राज्यपाल, मुख्यमंत्री, केंद्रीय गृह सचिव, मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव, गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक तथा पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों को संबोधित किया है।
आवेदन का उद्देश्य कथित तौर पर विभागीय जांच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और फाइल लंबित रखने के मामले में जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की मांग करना है।
अभिजीत रंजन का कटनी कार्यकाल भी रहा चर्चा में
अभिजीत कुमार रंजन वर्ष 2014 बैच के IPS अधिकारी हैं। वे कटनी में पुलिस अधीक्षक के रूप में पदस्थ रहे और उनके कार्यकाल में पुलिस की अपराध एवं मादक पदार्थों के खिलाफ कार्रवाइयों की खबरें सामने आती रही हैं। 2023 में प्रकाशित एक प्रोफाइल में भी उन्हें कटनी SP के रूप में 2014 बैच का IPS अधिकारी बताया गया था।
कटनी पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उनके SP कार्यकाल के दौरान विभिन्न आपराधिक मामलों में पुलिस कार्रवाई का उल्लेख मिलता है।
बाद में वे पुलिस परिवहन अनुसंधान संस्थान (PTRI), भोपाल से जुड़े रहे। दिसंबर 2025 के एक कार्यक्रम की रिपोर्ट में उन्हें PTRI के सहायक पुलिस महानिरीक्षक के रूप में उल्लेखित किया गया है।
अब असली सवाल क्या है?
पूरे मामले को दस्तावेज के आधार पर देखें तो विवाद का केंद्र अभिजीत रंजन के दोषी या निर्दोष होने का निष्कर्ष नहीं, बल्कि विभागीय जांच की प्रक्रिया है।
शिकायतकर्ता का दावा है कि—
CM की प्रशासनिक स्वीकृति → PHQ की जांच अनुशंसा → गृह विभाग की प्रक्रिया → ई-फाइल लंबित
इन सभी चरणों के बावजूद जांच शुरू नहीं हुई।
इसलिए अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विभागीय जांच की फाइल वास्तव में वर्तमान में किस स्तर पर लंबित है, उसे किस अधिकारी/कार्यालय के पास भेजा गया था, उस पर अब तक क्या कार्रवाई हुई और मुख्यमंत्री की प्रशासनिक स्वीकृति के बाद जांच शुरू करने में देरी का आधिकारिक कारण क्या है? इन सवालों का जवाब गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय के रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकता है।
निष्कर्ष: शिकायत ने उठाया जवाबदेही का सवाल
उपलब्ध दस्तावेज से इतना स्पष्ट है कि अभिजीत कुमार रंजन के खिलाफ विभागीय जांच को लेकर एक औपचारिक शिकायत वरिष्ठ संवैधानिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाई गई है। शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री की प्रशासनिक स्वीकृति, PHQ की अनुशंसा और विभागीय ई-फाइल के लंबित रहने को आधार बनाकर जांच प्रक्रिया में देरी पर सवाल उठाए हैं।
इस पूरे प्रकरण में अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड की होगी। यदि वास्तव में मुख्यमंत्री की प्रशासनिक स्वीकृति और PHQ की अनुशंसा के बाद भी फाइल लंबे समय से लंबित है, तो फाइल की टाइमलाइन और देरी के कारण सार्वजनिक होना प्रशासनिक पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
वहीं, यदि विभागीय रिकॉर्ड में फाइल पर नियमानुसार कार्रवाई जारी है, तो सरकार की ओर से उसकी स्थिति स्पष्ट किए जाने से शिकायत में उठे सवालों का जवाब मिल सकता है।
संबंधित अधिकारी का पक्ष
इस खबर के प्रकाशन के समय उपलब्ध शिकायत-पत्र में IPS अधिकारी अभिजीत कुमार रंजन का पक्ष दर्ज नहीं है। विभागीय जांच और लगाए गए आरोपों के संबंध में उनका आधिकारिक जवाब प्राप्त होने पर उसे भी खबर में प्रमुखता से शामिल किया जाना जाएगा।
स्रोत: 21 अगस्त 2026 को अधिवक्ता देवेंद्र शर्मा द्वारा विभिन्न संवैधानिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों को भेजा गया शिकायत आवेदन।



