खरी-अखरी(सवाल उठाते हैं पालकी नहीं)
कटनी। एक वक्त था जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पूरा देश सुनता था लेकिन जैसे-जैसे धागे खुलते चले गए और लोगों को हकीकत और जुमले का फर्क समझ में आने लगा तो लोगों ने भी बकवास सुनने से दूरियां बनानी शुरू कर दी। हालत यह है कि अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को वही सुन रहे हैं जिनकी मजबूरी (जरखरीदी गुलामी) है उन्हें सुनना। 2013 में 15 अगस्त के दिन गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली के लालकिले (जहां से देश का प्रधानमंत्री देश को संबोधित करता है) का प्रतिरूप (लकड़ी का लालकिला) बनवाकर, उसमें खड़े होकर देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपमानित किया था, यह अपमान मनमोहन सिंह का नहीं था बल्कि पूरे देश का था। बहरहाल उस दिन नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देश को किस तरीके से चलाना चाहिए इसकी नसीहत दी थी। दिल्ली की सत्ता कहां कहां फेल हो रही है। इसका आईना दिखाया था। उनके भाषण में देश के युवाओं, छात्र-छात्राओं, महिलाओं के भविष्य को लेकर बड़ी संवेदनशीलता थी। देश के भीतर बढ़ते हुए करप्शन, डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहे रुपये को लेकर बड़ी फिक्र थी। देश के भीतर कम हो रहे प्रोडक्शन, कम हो रहे नौकरियों के अवसर का जिक्र था।
2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से लेकर मई 2026 तक यानी इन 12 सालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा चुनावी रैलियों को छोड़ कर लगभग 3000 रैलियों में अपने भाषण के जरिए देश की जनता को सिर्फ और सिर्फ सुंदर भारत की तस्वीर और मुंगेरीलाल के रंगीन ख्वाब बेचे गए हैं। इन 12 सालों ने जनता की बात सुनने और कहने के बजाय 134 बार अपने मन की बात फोर्सली सुनाई है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी मन की बात जबरिया सुनाने के लिए सरकारी आकाशवाणी का ना केवल उपयोग किया गया बल्कि उसका ब्राड कास्ट 22 भारतीय, 21 बोलियों, 11 विदेशी भाषाओं में आकाशवाणी के 500 प्लस ब्राड कास्टिंग सेंटर्स से किया जाता है। पहले सत्ता धर्म के पद चिन्हों का अनुसरण करती हुई चला करती थी लेकिन उसके बाद मेरिट (डवलपमेंट) के हिसाब से सत्ता चलने लगी। लेकिन अब तो मेरिट सिस्टम के हर पुर्जे को ढ़ीला कर दिया गया। आपना मानुष को अपनी आइडियलाॅजी के खांचे में फिट किया जा रहा है। जो एक संकट की तरह से देश का सबसे बड़ा संकट बन चुका है। इस संकट की कड़ी में इस संकट को भी जोड़ा जा सकता है। पिछले 12 साल में ऐसी परिस्थितियों को निर्मित किया गया कि डेमोक्रेसी भंवर जाल में फंस चुकी है, चुनाव के जरिए देश के मुद्दों को उठाकर सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं को नगण्य कर दिया गया है।
इनसे भी बड़ा संकट तो अपनों को लेकर, अपने बच्चों के भविष्य को लेकर उनके सामने आकर खड़ा हो गया है जिन्होंने तालियां बजाई थी 2013 में लकड़ी के छद्म लालकिले पर खड़े हो कर भाषण दे रहे नरेन्द्र मोदी के भाषण को सुनना शुरू करते हुए मई 2026 तक रैलियों और मन की बात सुनकर तालियां बजाई थी। सांसदों (जिनमें पीएम मोदी और तमाम मंत्री शामिल हैं) ने एक एक गांव को गोद लिया था आइडियल गांव बनाने के लिए लेकिन आइडियल बनना दूर वो गांव अपना मूल स्वरूप ही गवां बैठे। इतना भर नहीं शौचालय, आवास योजना, रोजगार, किसानों की दुगुनी आय, मजदूरों की मजदूरी, एज्युकेशन सिस्टम को श्रेष्ठ बनाना, रिसर्च एंड डवलपमेंट आदि पर काम करने के लिए बजट में पैसा तो भरपूर दिया गया लेकिन वह भृष्टाचार के गटर में बह गया। देश को उसी रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया गया है जहां पर देश का मुखिया सार्वजनिक रूप से यह कहने से जरा सी भी शर्म महसूस नहीं करता है "मैं तो झोला उठाकर चल दूंगा"।
दो दिन पहले मई 2026 के अंतिम रविवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने "मन की बात" का 134वां एपीसोड देशवासियों के गले उतारा। अपने 32 मिनट के इस एपीसोड में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी ही सरकार द्वारा बनाए गए फ्रॉड सिस्टम से बर्बाद हो रहे छात्र छात्राओं के भविष्य को लेकर एक शब्द भी नहीं बोला। छात्र छात्राएं परीक्षा दें तो पेपर लीक, परीक्षा में सवालों का उत्तर दें तो कापी गोल, प्रतियोगी परीक्षा देने जाएं तो पूरा सिस्टम डगमगाने लगे यानी करोड़ों छात्रों का भंवर में फंसे होना लेकिन इसे लेकर अपने मन की बात में पीएम का खामोश रह जाना। देश के हर राज्य में महिलाओं, बच्चियों के साथ हो रहा यौनाचार और पीएम के मुंह से देशव्यापी शर्मिंदगी पर पश्चाताप का एक शब्द नहीं निकलना। मणिपुर से लेकर जम्मू-कश्मीर तक पैदा हो चुके इंटरनल सिक्योरिटी के मुश्किल हालातों पर पीएम मोदी का मौन रह जाना। देश के शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों का लगातार पैसा निकालना, यहां तक कि दो दिन पहले खत्म हुए मई के महीने में ही तकरीबन 32 हजार करोड़ से अधिक निकाल कर चलते बनना, भारत के भीतर की कंपनियों में विदेशी निवेशकों का इसलिए इन्वेस्टमेंट ना करना क्योंकि भारत पिछड़ गया है। इस पर भी पीएम मोदी ने एक शब्द नहीं कहा।
पीएम मोदी के नारे मेक इन इंडिया को जिंदा रखने के लिए कच्चा माल दे रहे चीन ने अगर कच्चा माल भेजना बंद कर दिया तो मेक इन इंडिया नारे को जुमला बनने में पल भर भी नहीं लगेगा अगर ऐसी स्थिति आ गई तो उससे कैसे निपटेंगे इस पर कुछ नहीं कहा क्योंकि उनके पास कोई विजन ही नहीं है। देश के भीतर आईआईटी के भीतर 38 फीसदी पद खाली पड़े हैं। यही हालात हैं एनआईटी में 29 फीसदी, आईआईएम में 31 फीसदी पद रिक्त हैं। युनिवर्सिटी के भीतर 2540 प्रोफेसर की जगह 1013 प्रोफेसर हैं यानी 56 फीसदी पद खाली है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी में भी एसोसिएट प्रोफेसर के 38 परसेंट पद रिक्त हैं। उच्च शिक्षा से तो ज्यादा दयनीय स्थिति तो प्राथमिक शिक्षा यानी पहली से लेकर आठवीं तक के छात्रों की है। यहां पर भी मोदी सरकार जिस तरीके से 80 करोड़ लोगों को मुफ्त 5 किलो अनाज बांट कर शर्मिंदगी की जगह गर्व का अनुभव करती है। पहली से लेकर आठवीं तक के बच्चों को भी फ्री में मिड डे मील बांटती है। यानी सरकार मानकर चलती है कि पहली से लेकर आठवीं तक छात्रों की जो संख्या है उसके पीछे पढ़ाई नहीं भूख है। मतलब सरकार बच्चों को शिक्षा नहीं खाना देती है। यानी बच्चे स्कूल में पढ़ने नहीं भोजन करने आते हैं। 12वीं तक आते आते बच्चों की संख्या 18 परसेंट पर आकर ठहर जाती है।
भारत के भीतर पढ़ाई, शिक्षा व्यवस्था, न्यू एज्युकेशन सिस्टम, परीक्षा देने के नए तौर तरीके, परीक्षा के उपरांत नंबरों की गणना करने के तौर तरीके जिस तरह से छात्रों को कमजोर कर रहे हैं उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश तो दे ही दिया है कि भारत के भीतर शिक्षा के जरिए भी आइडियलाॅजिकल लड़ाई लड़ी जा रही है, एक प्रोपेगेंडा की लड़ाई लड़ी जा रही है। हकीकत तो यही है कि भारत का एज्युकेशन मंत्रालय कोलेप्स हो चुका है। इतना भर नहीं भारत के भीतर बड़ी और मध्यम- छोटी इंडस्ट्री (एमएसएमई) मंत्रालय फेल हो चुके हैं। 2013 की तुलना में 2014 से लेकर मई 2026 तक भारत के भीतरी हालात हर क्षेत्र में बद से बदतर हो चले हैं। वैश्विक स्तर पर भी संकट और स्थितियां भयावह होती चली जा रही हैं। 2013 की तुलना में मंहगाई, बेरोजगारी ने पिछले सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये शाष्टांग दंडवत होकर शतकवीर बनने को बेताब है। भृष्टाचार के राक्षस ने पूरे देश को लील लिया है। देश के सभी बड़े से बड़े भृष्टाचारी मोदी-शाह की भारतीय जनता पार्टी में पनाह लेकर फल-फूल रहे हैं। देश का हर संवैधानिक संस्थान यहां तक कि चुनाव आयोग से लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत तक अपनी विश्वसनीयता खोती हुई सत्ता के दरबार की चाकरी करती हुई दिखाई दे रही है।
मोदी सत्ता और उसकी पार्टी चुनावों में मिल रही जीत से मदहोश होकर कैबिनेट की बैठकों तक में देश के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय पड़ रही भीषण गर्मी में अधिक से अधिक पानी पीने पर चर्चा कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने 32 मिनट की मन की बात में जिन मुद्दों से देश की जनता सातों दिन चौबीसों घंटे जद्दोजहद कर रही है उन पर कुछ कहने के बजाय हास्यास्पद या कहें लज्जाजनक तरीके से आम की किस्मों की बात करते रहे जबकि चंद दिन पहले ही जापान ने भारत से आम खरीदने का करार यह कहते हुए रद्द कर दिया कि भारत के आम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। इसका मतलब तो यही हुआ कि भारत की जनता आम के नाम पर जहर खा रही है। जम्मू-कश्मीर के लाॅ एंड आर्डर का जिक्र करने के बजाय कलारी नामक व्यंजन का जिक्र किया गया। दम तोड़ते शिक्षा विभाग का जिक्र करने की जगह एकल स्कूल चलाने वाली गिरजा अम्मा का जिक्र किया गया। करोड़ों रुपए बहाने के बाद भी गंगा जस की तस मैली क्यों है इस पर सफाई देने के बजाय प्लास्टिक कचरे से पटी पड़ी मनोरमा नामक नदी को साफ करने वाले आकाश गुप्ता को याद किया गया। अपने ही कार्यकाल 2014 से 2026 के बीच देश का अरबों खरबों लेकर भाग जाने वालों को क्यों नहीं लाया जा रहा है इस पर स्पष्टीकरण देने के बजाय नीदरलैंड से चोला राजवंश के समय की ताम्र पट्टिकाएं लाने पर अपने ही हाथों अपनी पीठ ठोंकी गई।
देश के मन में सवाल है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब मन की बात करने आते हैं तो उनका मन उनको इस बात के लिए धिक्कारता नहीं होगा कि उनके द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए कहे गए शब्द आज वर्तमान प्रधानमंत्री (नरेन्द्र मोदी) के ऊपर (खुद का थूका खुद पर) पलटवार नहीं कर रहा है "रुपया उसी देश का गिरता है जिस देश का प्रधानमंत्री गिरा हुआ होता है" । यानी यह तो सिध्द हो गया कि दुनिया गोल है। खुद का बोया खुद को ही काटना पड़ता है। पहली बार लगा कि देश के भीतर का मिडिल क्लास हिन्दू, जिसे एक सिस्टम के तहत पिरोया गया वह, वाकई खतरे में है। जब यह कह दिया गया कि हमें मुस्लिमों का वोट नहीं चाहिए तो कल को यह भी कहा जायेगा कि हमें मिडिल क्लास का वोट नहीं चाहिए। हमें ग्रेजुएट का वोट नहीं चाहिए। जिस तरह से चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को मैनेज कर लिया गया है तो कोई ताज्जुब नहीं होगा जब यह कह दिया जाएगा कि हमें किसी का भी वोट नहीं चाहिए सत्ता में बने रहने के लिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 12 साल में देश को अगर कुछ दिया है तो वह है "शर्म और अयोग्यता को एक नये स्तर पर लाना (YOU HAVE TAKEN SHAMELESS AND INCOMPETENCE TO A WHOLE NEW LABEL. इसके बावजूद भी देश के मन की बात यह है कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से 15 अगस्त 2026 को असली लालकिले से 2013 में कहे गये शब्दों को सुनना चाहता है। क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने मन की बात छोड़ कर देश के मन की बात का मान रखेंगे ?
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार


